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Thursday, 28 July 2016

महाश्वेता देवी का जीवन और साहित्य


लेखक: कृपाशंकर चौबे

चौदह जनवरी 1926 को ब्रह्म मुहूर्त में, ढाका के जिंदाबहार लेन में जिस शिशु का जन्म हुआ, उसकी मौजूदा परिणति स्वाभाविक है। महाश्वेता देवी के जन्म के समय माँ धरित्री देवी मायके में थीं। माँ की उम्र तब 18 वर्ष और पिता मनीष घटक की 25 वर्ष थी। पिता मनीष घटक ख्यातिप्राप्त कवि और साहित्यकार थे। माँ धरित्री देवी भी साहित्य की गंभीर अध्येता थीं। वे समाज सेवा में भी संलग्न रहती थीं। महाश्वेता ने जब बचपन में साफ-साफ बोलना शुरू किया तो उन्हें जो जिस नाम से पुकारता, वे भी उसी नाम से उसे पुकारतीं। पिता इन्हें तुतुल कहते थे तो ये भी पिता को तुतुल ही कहतीं। आजीवन पिता उनके लिए तुतुल ही रहे। बचपन से ही महाश्वेता मातृभक्त रही हैं। थोड़ी बड़ी हुईं तो ढाका के इंडेन मांटेसरी स्कूल में भर्ती कराया गया। चार वर्ष की उम्र में ही बांग्ला लिखना-पढ़ना सीख गई थीं। पिता को नौकरी मिल गई थी। कई बार बदली हुई। तबादले पर उन्हें ढाका, मनमनसिंह, जलपाईगुड़ी, दिनाजपुर और फरीदपुर जाना पड़ा। ढाका के जिंदाबहार लेन में महाश्वेता का ननिहाल था और नतून भोरेंगा में पिता का गाँव। ननिहाल आना-जाना लगा रहता था। दुर्गापूजा की छुट्टियाँ तो ननिहाल में ही कटतीं। बचपन में महाश्वेता नटखट थीं। इतनी कि एक बार ननिहाल में रहते हुए भोरंगा की दुर्गापूजा देखने गई थीं। चार भाई-बहनों के साथ। भाई बहनों को लेकर वे एक स्नान घाट से उतरीं। स्नान करने और तैरने का मजा काफूर हो गया जब चारों बच्चे डूबने से बचे। उस दिन सप्तमी की पूजा थी। घर आईं तो खूब डाँट पड़ी थी।

पिता जब जलपाईगुड़ी में थे तो तिस्ता में ज्वार-भाटा देखा। बहुत रोमांचित हुईं। सिर तक पानी आ गया। वह स्मृति बाद में 'चोट्टि मुंडा और उसका तीर' लिखने में उपयोग में आई। 1935 में पिता का तबादला मेदिनीपुर हुआ तो महाश्वेता का वहाँ के मिशन स्कूल में दाखिला कराया गया लेकिन उसके अगले वर्ष ही मेदिनीपुर से नाता टूट गया क्योंकि उन्हें शांतिनिकेतन भेजने का फैसला किया गया। तब वे दस वर्ष की थीं। शांतिनिकेतन के प्रासपेक्टस के मुताबिक लाल किनारेवाली साड़ी, बिस्तर, लोटा, गिलास वगैरह खरीदा गया। 1936 में शांतिनिकेतन गईं तो खूब रोईं। माँ छूटीं, पिता छूटे। उधर शांतिनिकेतन में मिली नई जगह। कई एक सुंदर भवन। लाइब्रेरी, सिंह सदन, श्री भवन, कला भवन, उत्तरायण, कोणार्क...। स्थापत्य कला में सभी एक से सुंदर एक। वहाँ महाश्वेता को उन्मुक्त प्रकृति मिली। नई सहेलियाँ मिलीं। आश्रम की दिनचर्या ऐसी थी कि सभी छात्र सुबह से देर रात तक व्यस्त रहते। शिक्षा का माध्यम बांग्ला होने के बावजूद अंग्रेजी अनिवार्य थी। लड़के शिशु भवन और लड़कियाँ श्री भवन में रहती थीं। भोर का घंटा बजते ही उठकर बिस्तर सरिहाना, फ्रेश होना, किचन में जाना, फिर क्लास। क्लास के बाद स्नान, फिर भोजन। लेख लिखना है तो लाइब्रेरी से लेकर किताब पढ़ना। बच्चों में पढ़ाई के साथ ही गीत-संगीत-नाटक-चित्रकला में भी रुचि जगाई जाती थी। उससे भी बढ़कर प्रकृति से प्यार करना सिखाया जाता था।

शांतिनिकेतन में महाश्वेता का जल्दी ही मन लग गया। वहाँ उन्हें श्रेष्ठ शिक्षक मिले। बकौल महाश्वेता, 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी पढ़ाते थे। सभी आश्रमवासी उन्हें छोटा पंडित जी कहते थे। 1937 में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने भी बांग्ला का क्लास लिया था उत्तरायण के बरामदे में। तब सातवीं कक्षा की छात्रा महाश्वेता के लिए यह अविस्मरणीय घटना थी। गुरुदेव ने पाठ परिचय से बलाई पढ़ाया था। इसके पहले 1936 में बंकिम शतवार्षिकी समारोह में रवींद्रनाथ का भाषण सुना था महाश्वेता ने।

महाश्वेता शांतिनिकेतन में तीन साल ही रह सकीं क्योंकि 1939 में उन्हें कलकत्ता बुला लिया गया। शांतिनिकेतन जाने पर वे जितना रोई थीं, उससे ज्यादा उसके छूटने पर रोई थीं। पिता बदली होकर कलकत्ता आ गए थे। तब महाश्वेता से छोटे पाँच भाई-बहन थे। माँ गर्भवती थीं और उसी अवस्था में सीढ़ी से फिसलकर गिर पड़ी थीं। बिस्तर पर पड़ी माँ का जीवन खतरे में था। तब महाश्वेता महज तेरह साल की थीं पर उसी उम्र में उन्हें बड़ा होना पड़ा। अस्वस्थ माँ की देखभाल करना, साथ ही भाई-बहनों को सँभालना, उन्हें नहलाना, थाली में दाल भात सानकर सबको खिलाना, कहानी सुनाना, रात में हाथ-पैर धुलवाकर सबको सुलाना महाश्वेता की दिनचर्या बन गई। वे छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई में भी मदद करतीं और किसी चूक पर डाँटती भी। इससे माँ की डाँट महाश्वेता को सुननी पड़ती। माँ डाँट पिलातीं कि छोटों को क्यों डाँटती हो?

1939 में शांतिनिकेतन से लौटने के बाद कलकत्ता के बेलतला बालिका विद्यालय में आठवीं कक्षा में महाश्वेता का दाखिला हुआ। उसी साल उनके काका ऋत्विक घटक भी घर आकर रहने लगे। वे 1941 तक यहाँ रहे। 1939 में बेलतला स्कूल में महाश्वेता की शिक्षिका थीं अपर्णा सेन। उनके बड़े भाई खेगेंद्रनाथ सेन 'रंगमशाल' निकालते थे। उन्होंने एक दिन रवींद्रनाथ की पुस्तक 'छेलेबेला' देते हुए महाश्वेता से उस पर कुछ लिखकर देने को कहा। महाश्वेता ने लिखा और वह 'रंगमशाल' में छपा भी। यह महाश्वेता की पहली रचना थी। स्कूली जीवन में ही महाश्वेता ने राजलक्ष्मी और धीरेश भट्टाचार्य के साथ मिलकर एक अल्पायु स्वहस्तलिखित पत्रिका निकाली - 'छन्नछाड़ा।' महाश्वेता बचपन में अपराध साहित्य भी पढ़ती थीं और अखबारों के क्रासवर्ड का हल भी करती थीं। वह आदत अब भी वैसी ही बनी हुई है।

नानी, दादी व माँ ने महाश्वेता को अच्छे साहित्य पढ़ने के संस्कार दिए। कोई किताब पढ़ने के बाद कोई प्रसंग दादी माँ पूछ भी लेती थीं। बचपन में दादी की लाइब्रेरी से ही लेकर महाश्वेता ने 'टम काकार कुटीर' पढ़ा था। घर का पूरा माहौल ही शिक्षा और संस्कृतमय था। इसलिए लिखने-पढ़ने का एक नियमित अभ्यास छुटपन में ही हो गया। हेम-बंधु-बंकिम-नवीन-रंगलाल को उन्होंने 12 वर्ष की उम्र में ही पढ़ लिया। माँ देश प्रेम और इतिहास की पुस्तकें पढ़ने को देतीं और कहतीं - अभी इन पुस्तकों को पढ़ना जरूरी है। बाद में अपनी इच्छा से पढ़ना।

घर में वैसे पढ़ने के प्रति हरेक सदस्य का अलग से अनुराग था। यह भी सही था कि पढ़ने के अलावा रिक्रिएशन का और कोई साधन नहीं था। बांग्ला की तुलना में अंग्रेजी की पढ़ाई महाश्वेता ने बाद में शुरू की जब वे बेलतला बालिका विद्यालय में आठवीं में पहुँचीं। तब इंग्लिश क्लासिक्स पढ़ना अनिवार्य था। इस तरह पुस्तक प्रेम बचपन से ही रहा। पुस्तक ही उनके मन का गुरु रहा है। पुस्तक पाते ही महाश्वेता दूसरी दुनिया में खो जाती हैं। पिता की भी बड़ी समृद्ध लाइब्रेरी थी। तबके नोबेल पुरस्कार प्राप्त कई लेखकों की रचनाएँ महाश्वेता ने पिता की लाइब्रेरी से ही लेकर पढ़ी थीं। 1939-1944 के दौरान महाश्वेता के पिता ने कलकता में सात बार घर बदले। 1942 में घर के सारे कामकाज करते हुए महाश्वेता ने मैट्रिक की परीक्षा पास की। उस वर्ष (1942) भारत छोड़ो आंदोलन ने महाश्वेता के किशोर मन को बहुत उद्वेलित किया। 1943 में अकाल पड़ा। तब महिला आत्मरक्षा समिति के नेतृत्व में उन्होंने राहत और सेवा कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। अकाल के बाद महाश्वेता ने कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'पीपुल्स वार' और 'जनयुद्ध' की बिक्री भी की थी। पर पार्टी की सदस्य वे कभी नहीं हुईं।

अकाल राहत व सेवा कार्यों में महाश्वेता की संगिनी थीं तृप्ति भादुड़ी (मित्र)। ये दोनों सहपाठी थीं। दोनों एक दिन काली घाट में शिरीष के एक पेड़ के नीचे लगे राहत शिविर में गईं। वहाँ लोगों को मरते हुए देखा। ऐसी कई मौतों की वे प्रत्यक्षदर्शी थीं। इसका उनके जीवन और चिंतन पर काफी प्रभाव पड़ा।

उधर किशोरवय में ही कंधे पर आ चुके पारिवारिक दायित्व को निभाने के प्रति भी महाश्वेता सदा सजग रहतीं। माँ के जीवन के आखिरी वर्षों में महाश्वेता ने पुरानी सिलाई मशीन चलाकर कपड़ों की सिलाई की। मच्छरदानी और बालिश वगैरह की भी सिलाई की। गमलों में पेड़-पौधे लगाना और खाना बनाने का काम भी अबाध गति से चलता रहा। 1944 में महाश्वेता ने कलकत्ता के आशुतोष कालेज से इंटरमीडिएट किया। पारिवारिक दायित्व से कुछ मुक्ति मिली यानी वह भार छोटी बहन मितुल ने सँभाला तो महाश्वेता फिर शांतिनिकेतन गईं कालेज की पढ़ाई करने। वहाँ 'देश' के संपादक सागरमय घोष आते-जाते थे। उन्होंने महाश्वेता से 'देश' में लिखने को कहा। तब महाश्वेता बीए तृतीय वर्ष में थीं। उस दौरान उनकी तीन कहानियाँ 'देश' में छपीं। हर कहानी पर दस रुपये का पारिश्रमिक मिला था। तभी उन्हें बोध हुआ कि लिख-पढ़कर भी गुजारा संभव है। उन्होंने शांतिनिकेतन से 1946 में अंग्रेजी में आनर्स के साथ स्नातक किया। उसके साल भर बाद 1947 में प्रख्यात रंगकर्मी विजन भट्टाचार्य से उनका विवाह हुआ। विजन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। वह समय कम्युनिस्टों के लिए बहुत मुश्किलभरा था। कम्युनिस्टों को अन्न-वस्त्र जुटाने के लिए काम ढूँढ़ने में काफी मुश्किलें पेश आती थीं। 1948 में पदमपुकुर इंस्टीट्यूशन में अध्यापन कर महाश्वेता ने घर का खर्चा चलाया। उसी वर्ष पुत्र नवारुण भट्टाचार्य का जन्म हुआ। 1949 में महाश्वेता को केंद्र सरकार के डिप्टी एकाउंटेट जनरल, पोस्ट एंड टेलीग्राफ ऑफिस में अपर डिवीजन क्लर्क की नौकरी मिली। लेकिन एक वर्ष के भीतर ही, चूँकि पति कम्युनिस्ट थे, सो उनकी नौकरी चली गई। महाश्वेता अतुल गुप्त के पास गईं। उनकी नोटिस के दबाव में महाश्वेता की फिर बहाली हुई लेकिन इस बार महाश्वेता की दराज में मार्क्स और लेनिन की किताबें रखकर कम्युनिस्ट होने का आरोप लगाकर और अस्थायी होने के चलते दुबारा नौकरी से उन्हें हटा दिया गया। नौकरी जाने के बाद जीवन-संग्राम ज्यादा कठिन हो गया। महाश्वेता ने कपड़ा साफ करने के साबुन की बिक्री से लेकर ट्यूशन करके घर का खर्चा चलाया। यह क्रम 1957 में रमेश मित्र बालिका विद्यालय में मास्टरी मिलने तक चला। विजन भट्टाचार्य से विवाह होने से ही महाश्वेता जीवन संग्राम का यह पक्ष महसूस कर सकीं और एक सुशिक्षित, सुसंस्कृत परिवार की लड़की होने के बावजूद स्वेच्छा से संग्रामी जीवन का रास्ता चुन सकीं।

संघर्ष के इन दिनों ने ही लेखिका महाश्वेता को भी तैयार किया। उस दौरान उन्होंने खूब रचनाएँ पढ़ीं। विश्व के मशहूर लेखकों-चिंतकों की रचनाएँ, इलिया एरेनबर्ग, अलेक्सी टालस्टाय, गोर्की, चेखव, सोल्झेनित्सिन, मायकोवस्की और रूस के कई अन्य लेखकों की पुस्तकें पढ़ीं। लेकिन मजे की बात ये है कि मार्क्स और लेनिन को कभी नहीं पढ़ पाईं। बाद में पति और बेटे ने भी बहुत कहा, फिर भी नहीं पढ़ा। हाँ ये है कि दरिद्रता, भूख, बेबसी, शोषण को नजदीक से देखा। यह थ्योरी उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव से अर्जित की। उसी समय विजन भट्टाचार्य को एक हिंदी फिल्म की कहानी लिखने के सिलसिले में मुंबई जाना पड़ा। उनके साथ महाश्वेता भी गईं। मुंबई में महाश्वेता के बड़े मामा सचिन चौधरी थे। मामा के यहाँ ही महाश्वेता ने पढ़ा - वी.डी. सावरकर, 1857। उससे इतनी प्रभावित हुईं कि उनके मन में भी इसी तरह का कुछ लिखने का विचार आया। तय किया कि झाँसी की रानी पर वे किताब लिखेंगी। उन पर जितनी किताबें थीं, सब जुटाकर पढ़ा। मुंबई से आने के बाद ट्यूशन वगैरह तो चल ही रहा था - लेखन को भी जीविका का साधन बनाने का विचार दृढ़ होता गया।

महाश्वेता ने प्रतुल गुप्त को अपने मन की बात बताई कि वे झाँसी की रानी पर लिखना चाहती हैं। महाश्वेता ने झाँसी की रानी के भतीजे गोविंद चिंतामणि से पत्र व्यवहार शुरू किया। सामग्री जुटाने और पढ़ने के साथ-साथ उत्साहित होकर महाश्वेता ने लिखना भी शुरू कर दिया। फटाफट चार सौ पेज लिख डाले। पर इतना लिखने के बाद उनके मन ने कहा - यह तो कुछ भी नहीं हुआ। उन्होंने उसे फाड़कर फेंक दिया। झाँसी की रानी के बारे में और जानना पड़ेगा। तो इसके लिए छह वर्ष के बेटे नवारुण भट्टाचार्य और पति को कलकत्ता में छोड़कर अंततः झाँसी ही चली गईं। तब न पति के पास नौकरी थी न उनके पास। जैसे-तैसे शुभचिंतकों से पैसे लेकर वे 1954 में झाँसी की यात्रा पर निकलीं। अकेले उन्होंने बुंदेलखंड के चप्पे-चप्पे को अपने कदमों से नापा। वहाँ के लोकगीतों को कलमबद्ध किया। तब झाँसी की रानी की जीवनी लिखने वाले वृदाँवनलाल वर्मा झाँसी कंटोनमेंट में रहते थे। उनसे भी वे मिलीं। उनके परामर्श के मुताबिक झाँसी की रानी से जुड़े कई स्थानों का दौरा किया। बुंदेलखंड से लौटकर महाश्वेता ने नए सिरे से 'झाँसीर रानी' लिखी और 'देश' में यह रचना धारावाहिक छपने लगी। न्यू एज ने इसे पुस्तक के रूप में छापने के लिए महाश्वेता को पाँच सौ रुपये दिए। इस तरह महाश्वेता की पहली किताब 1956 में आई।

लेखिका ने अपनी पहली पुस्तक 'झाँसीर रानी' (हिंदी में 'झाँसी की रानी') स्वर्गीय श्री गोविंद राम चिंतामणि तांबे, लक्ष्मणराव झाँसीवाले और ग्वालियर में रानी साहिबा लक्ष्मीबाई की छतरी के नीचे हेमंत ऋतु में बिताए गए एक दिन की पवित्र स्मृति को समर्पित किया है। महाश्वेता ने जिस ढंग से इस उपन्यास को लिखा है, उससे लेखिका का रोमांटिक आवेग, रानी के जीवन की घटनाओं की नाटकीयता उसमें उपस्थित हो उठी है। पुस्तक लिखते समय लोकगीत, लोककथा, बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास, रासो लोककथाएँ, लोगों के मुख से सुने गान ही लेखिका की प्रेरणा के स्रोत रहे। तात्पर्य यह है कि इस जीवनीमूलक उपन्यास को लिखने के लिए लक्ष्मीबाई के बारे में व्याप्त तरह-तरह की किंवदंतियों के घटाटोप को पार कर तथ्यों व प्रामाणिक सूचनाओं का उन्होंने सहारा लिया। इस ग्रंथ को महाश्वेता ने कलकत्ता में बैठकर नहीं, बल्कि सागर, जबलपुर, पूना, इंदौर, ललितपुर, झाँसी, ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं के साथ चलते हुए लिखा। इसमें कथा का प्रवाह कल्पना के सहारे नहीं, बल्कि तथ्यों व दस्तावेजों के सहारे निर्मित किया गया है। इसीलिए महाश्वेता की पुस्तक जीवनी के साथ-साथ इतिहास का भी आनंद देती है। 'झाँसीर रानी' लिखने के बाद ही महाश्वेता समझ पाईं कि वे कथाकार बनेंगी। वे अपनी रचनाओं में इतिहास, भूगोल और लोक संस्कृति पर खास जोर देतीं। वे इतिहास से कुछ कथा पाती हैं तो भूगोल और लोक संस्कृति से भी। झाँसी-बुंदेलखंड में रहते हुए कई स्थानों का स्केच उन्होंने बनाया। 'झाँसीर रानी' पुस्तक में जो मानचित्र है, उन्हीं का बनाया हुआ है। महाश्वेता ने जो साहित्य रचा, उसमें अधिकांश के लिए पढ़ना और सामग्री जुटाना एक तरह से अनिवार्य रहा है। एक विषय पर लिखने के लिए उन्हें काफी कुछ पढ़ना और श्रम करना पड़ता है। महाश्वेता में शुरू से ही प्रखर इतिहास चेतना रही है, जो लगातार उनके लेखन में हावी रही है। इसके लिए तथ्यों पर निर्भर रहना ही पड़ता है। जैसे शुरुआती कृतियों 'झाँसीर रानी', 'नटी', 'आंधार मानिक', 'अमृतसंचय', 'विवेक विदाय पाला' से लेकर 'जल व स्तनदायिनी' तक के लिए उन्हें तथ्य संग्रह करने पड़े हैं। उन पर मनन करना पड़ा है, मनन के बाद उनका उन्होंने इस्तेमाल किया है।

'झाँसीर रानी' (1956) के बाद महाश्वेता की दूसरी पुस्तक 'नटी' 1957 में आई। उसी कड़ी में 'जली थी अग्निशिखा' आई। ये तीनों किताबें 1857 के महासंग्राम पर केंद्रित हैं। ह्यूरोज ने ही कहा है कि समय और युग की सभी रूढ़ियों को तोड़कर लक्ष्मीबाई ने अपने को एक योग्य व सक्षम सेनानायक सिद्ध किया था। ह्यूरोज के इस कथन को महाश्वेता ने 'जली थी अग्निशिखा' में भी उद्धृत किया है। रानी ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध किया था। उनकी इस भूमिका को कभी छोटा कर नहीं देखा जा सकता। इस भूमिका में बेहद तात्पर्यपूर्ण यह है कि झाँसी की रानी के दृष्टांत से प्रेरित होकर ही मध्य भारत में एक जन विद्रोह जन्मा।

साठ का दशक महाश्वेता के जीवन के लिए बड़ा उथल-पुथल वाला रहा। 1962 में विजन भट्टाचार्य से उनका विवाह-विच्छेद हो गया। असीत गुप्त से दूसरा विवाह हुआ। किंतु उनसे भी 1975 में विवाह-विच्छेद हो गया। उसके बाद उन्होंने लेखन और आदिवासियों के बीच कार्य कर हमेशा सृजनात्मक कार्यों में अपने को व्यस्त रखा। यह भी गौर करने योग्य है कि महाश्वेता कभी कर्तव्य से च्युत नहीं हुईं। घर में बेटी, दीदी, पत्नी, माँ और दादी माँ की भूमिका उन्होंने बखूबी निभाई। तीसरी पीढ़ी के बच्चे भी महाश्वेता के घर आकर ज्यादा आजादी व आनंद का अनुभव करते हैं। भाई बहन के बच्चों के साथ महाश्वेता का व्यवहार भी बहुत ही आत्मीय और अनौपचारिक रहता है। महाश्वेता ने अपनी कई किताबें अपने पत्रकार पौत्र तथागत भट्टाचार्य को समर्पित की हैं। महाश्वेता अपने घर में बिलकुल सादगी से रहती हैं। मनोरंजन के साधन भी नहीं पर बच्चे अवकाश पाते ही उनके घर की दौड़ लगाते हैं। महाश्वेता आरंभ से ही अलग किस्म की महिला रही हैं। अब भी हैं इसलिए दो-दो बार विवाह-विच्छेद होने के बावजूद उनके सम्मान पर कोई आँच नहीं आई। वे वही महाश्वेता रहीं। महाश्वेता का उनके पति भी बहुत सम्मान करते थे। इसलिए विवाह-विच्छेद के बाद भी विजन या असीत ने महाश्वेता के विरुद्ध या महाश्वेता ने उन दोनों के विरुद्ध कभी कुछ नहीं कहा। विजन की मुत्यु के बाद महाश्वेता दिन भर वहाँ रहीं। वहाँ महाश्वेता की उपस्थिति को बहुत सम्मान दिया गया।

आम लेखकों से महाश्वेता का जीवन और साहित्य भिन्न है तो उसकी वजह है। झारखंड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के आदिवासियों और शोषितों की व्यथा-कथा लिखने वाली महाश्वेता लेखक के सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप में भरोसा रखती हैं। हमारे देश में काम से ज्यादा काम का प्रचार होता है। महाश्वेता अपने को चौबीसों घंटे काम में व्यस्त रखती हैं। प्रचार से दूर भागती हैं। विभिन्न विसंगतियाँ देखकर मन में जो उद्विग्नता होती है, वह लेखन में उतर आती है।

1964 में महाश्वेता को विजयगढ़ ज्योतिष राय कालेज में अध्यापन का अवसर मिला। वहाँ उन्होंने बीस साल अध्यापन किया और 1984 में स्वेच्छावकाश ले लिया। हर काल-परिस्थिति में लिखना पढ़ना जारी रहा। महाश्वेता की रचनाएँ अन्याय के विरुद्ध इनसान के संघर्ष की महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। उनकी कृतियों को पढ़ना इतिहास में भिन्न-भिन्न कालखंड की समाज व्यवस्था और तब व्यवहार होनेवाली जनभाषा और शोषक व शोषितों के बीच संघर्ष के सभी पहलुओं से वाकिफ होना है। उदाहरण के लिए महाश्वेता की शवदाह और मृत्यु पर कई कथाकृतियाँ हैं लेकिन उनमें भिन्न समाजों, भिन्न तबकों में भिन्न तरीके के लोकाचार हैं। बिरसा मुंडा ने मृतदेह का पैसा लेकर खाद खरीदा था क्योंकि पैसा तो मृतदेह के काम आएगा नहीं। वह तो जीवन के ही काम आएगा। जीवित व्यक्ति के लिए ही तो अन्न की आवश्यकता है। इसी अपराध में वह अपने समाज से बहिष्कृत होता है और जंगल में चला जाता है जहाँ उसे लगता है कि आदिवासियों को शिक्षित करने की जरूरत है, जल, जंगल और जमीन पर उनके अधिकार का आदिवासियों में बोध कराने के लिए संग्राम चलाने का वह फैसला करता है। अपने उपन्यास 'अरण्येर अधिकार' (जंगल के दावेदार) में महाश्वेता समाज में व्याप्त मानवीय शोषण और उसके विरुद्ध उबलते विद्रोह को उम्दा तरीके से रखांकित करती हैं। 'अरण्येर अधिकार' में उस बिरसा मुंडा की कथा है जिसने सदी के मोड़ पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनजातीय विद्रोह का बिगुल बजाया। मुंडा जनजाति में समानता, न्याय और आजादी के आंदोलन का सूत्रपात बिरसा भगवान ने अंग्रेजों के खिलाफ किया था। असफलता हाथ लगी लेकिन आंदोलन के पतन से सपनों का अंत नहीं होता। सपने निरंतर कुलबुलाते हैं।

'अरण्येर अधिकार' आदिवासियों के सशक्त विद्रोह की महागाथा है जो मानवीय मूल्यों से सराबोर है। महाश्वेता ने मुख्य मुद्दे पर उँगली रखी है। मसलन बिरसा भगवान का विद्रोह सिर्फ अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं था, अपितु समकालीन सामंती व्यवस्था के विरुद्ध भी था। बिरसा मुंडा के इन पक्षों को सहेजकर साहित्य और इतिहास में प्रकाशित करने का श्रेय महाश्वेता को ही है। 'अरण्येर अधिकार' लिखने के पीछे की कहानी ये है कि 1974 में फिल्म निर्माता शांति चौधरी ने महाश्वेता से बिरसा मुंडा पर कुछ लिखकर देने को कहा। श्री चौधरी, बिरसा पर फिल्म बनाना चाहते थे। बिरसा पर लिखने के लिए महाश्वेता ने पहले तो कुमार सुरेश सिंह की किताब पढ़ी। फिर दक्षिण बिहार गईं, वहा के लोगों से मिलीं। कई तथ्य संग्रह किए। फिर लिखा 'अरण्येर अधिकार'1979 में जब इस किताब पर साहित्य अकादमी अवार्ड मिला तो आदिवासियों ने जगह-जगह ढाक बजा-बजाकर गया था - 'हमें साहित्य अकादमी मिला है।' तब मुंडा नाम से ही उनमें असीम गौरव बोध जगा था। जो मुंडा भूमिज नाम से सरकारी रेकार्ड में दर्ज थे, उन्होंने उपने को मुंडा नाम से दर्ज करने की प्रशासन से दरखास्त की थी। साहित्य अकादमी मिलने पर मुंडाओं ने महाश्वेता का अभिनंदन करने के लिए उन्हें अपने यहाँ (मेदिनीपुर में) बुलाया। 1979 की उस सभा में आदिवासी वक्ताओं ने कहा था - 'मुख्यधारा ने हमें कभी स्वीकृति नहीं दी। हम इतिहास में नहीं थे। तुम्हारे लिखने से हमें स्वीकृति मिली।' साहित्य अकादमी पाने पर महाश्वेता को जितनी खुशी नहीं हुई, उससे ज्यादा इन आदिवासियों की प्रसन्नता से हुई। महाश्वेता को लगा, आदिवासियों के बारे में उनका दायित्व और बढ़ गया है। उन्होंने आदिवासियों के लिए यथासंभव काम करते जाने और उनके बारे में और भी जानने की कोशिश जारी रखी। मुंडा विद्रोह, खेड़िया विद्रोह पढ़कर ही बैठ नहीं गईं। जहाँ जो भी मिलता, पढ़तीं। जितना बन पड़ता, काम करतीं। आदिवासी इलाकों में जातीं, उनके सुख-दुख में शरीक होतीं। उनका लेखन शोषित शासित आदिवासी समाज और उत्पीड़ित दलितों में केंद्रित हो गया। न्यूनतम मजदूरी, मानवीय गरिमा, सड़क, पेयजल, अस्पताल, स्कूल की सुविधा से वंचित भूमिहीन होने को अभिशप्त इन आदिवासियों और दलितों को आजादी के इतने साल बाद भी न्याय नहीं मिला है। यही महाश्वेता की चिंता के कारण बनते हैं। महाश्वेता के भीतर की वेदना को 'टेरोडेक्टिल' उपन्यास की चंद पंक्तियों में देखा जा सकता है जब एक पात्र कहता है, 'आदिवासी कल्याण के मद में प्राप्त रुपयों से इन राजपथों, सड़कों का निर्माण हुआ है, ताकि मालिक, महाजन, दलाल और अय्याश लोग आदिवासियों द्वारा बनाई शराब और आदिवासी युवतियों के इच्छुक लफंगे, अहंकारी युवक सीधे आदिवासियों की बस्तियों तक पहुँच सकें। ...ये आदिवासी जब इन रास्तों पर चलते हैं तो वे उनकी शिक्षा व्यवस्था, सिंचाई के पानी, पीने के पानी और स्वास्थ्य केंद्रों की समाधि के उपर पाँव रखकर चलते हैं... उनका प्राप्य क्या है? भारत की कुल आबादी के सात दशमलव सात छह प्रतिशत जो लोग हैं, उन पाँच करोड़ छियानबे लाख, अठाइस हजार छह सौ अड़सठ लोगों का प्राप्य क्या है, यह अब भी उन्हें नहीं बताया गया है... न दूरदर्शन बताता है, न रेडियो न अखबार, न एमएलए, एमपी के प्रत्याशी, न पंच न पंचायत, न राज्य सरकारें न आदिवासी सलाहकार... न बताने की इस नीति का अनुसरण करने के लिए कितना विपुल श्रम और अर्थ व्यय होता है। कितने ही दिग्गज बुद्धिजीवी इसमें लगे हैं। कितने ही राजनैतिक दाँव-पेंच इसे लेकर चले जाते हैं। उनका प्राप्य क्या था, इसे जाने बिना ही आदिवासी अपनी प्रेतछाया से ढकी जिंदगियाँ लेकर इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर जाएँगे।'

ये एक-एक शब्द महाश्वेता के भीतर खौल रहे हैं तो इसलिए कि आदिवासियों के सुख-दुख की वे सहयात्री रही हैं। महाश्वेता की यह चिंता उनकी दूसरी कृतियों में भी देखी जा सकती है। महाश्वेता देवी ने मनुष्य होने के कारण नहीं, लेखक होने के नाते भी सदियों से उत्पीड़ित आदिवासियों की व्यथा-कथा को अपने उपन्यासों का कथ्य बनाया है। आदिवासियों के संगठित संग्राम की झलक महाश्वेता की कई रचनाओं में मिलती है। बिहार-बंगाल के संथालों से अपना लोहा मनवाने और आदिवासियों की स्वतंत्र प्रवृत्ति पर नियंत्रण करने के लिए गोरों ने जब जंगल उत्पादों की खरीद शुरू की तो संथाल भड़क उठे। संथाल परगना के आदि विद्रोही तिक्का माँझी ने विद्रोह की कमान सँभाली। महाश्वेता ने 'शालगिरह की पुकार पर' कृति में संथाल जीवन और अँग्रेजों के विरुद्ध उनके ऐतिहासिक संग्राम को दर्ज किया है। 'शालगिरह की पुकार पर' में महाश्वेता देवी की स्थापना है - हिंदुस्तान में गोराशाही लूट पर टिकी थी। व्यापार करने आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने लूट-व्यापार को स्थायी बनाने के लिए षड्यंत्र और सैनिक हस्तक्षेप के जरिए पलासी-युद्ध में जीत के बाद सत्ता हाथ में ले ली। मगर रियाया पर प्रभुत्व स्थापित करना आसान न था। गोरों के खिलाफ असंतोष फैलने लगा था। मुनाफे के लिए गोरे अकाल और भूख की तिजारत कर रहे थे। अपने शासन क्षेत्र का विस्तार कर रहे थे। संथाल जीवन और गोरों के विरुद्ध उनके ऐतिहासिक संग्राम की गाथा शालगिरह की पुकार पर में मार्मिक तरीके से व्यक्त हुई है। यह न केवल इतिहास है बल्कि हर भारतीय के लिए गौरव-स्मृति भी है। 'चोट्टि मुंडा और उसका तीर' में महाश्वेता देवी पूछती हैं - आदिवासियों के हित में कानून बने पर लागू कितने हुए? क्या बंधुआ आदिवासी मुक्त हो गए? बेगी प्रथा समाप्त हुई? हवाई योजनाविदों का विश्वास है कि इन इलाकों में कुछ ग्राम है जहाँ सबके सब कुष्ट रोगी हैं। पर ऐसा गाँव नहीं मिलता। कागजी विकास योजनाओं के पीछे दृष्टि है कि आदिवासी मनुष्य नहीं, तमाशे के खिलौने हैं। जब आदिवासी समाज में हिंसा का ज्वार उभरता है, तब दिल्ली हतप्रभ रह जाती है। आदिवासियों के बारे में दिल्ली की समझ अंग्रेजों जैसी है। 'चोट्टि मुंडा और उसका तीर' को पढ़े बगैर आदिवासी समाज की हकीकत को समझना मुश्किल है। 'अमृत संचय' उपन्यास 1857 से थोड़ा पहले प्रारंभ होता है। संथाल में अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत, नीलकर को लेकर असंतोष और अपेक्षित वेतन न मिलने के कारण सेना भी नाखुश थी। उपन्यास इसी संधिस्थल से शुरू होकर तैंतीस साल बाद वहाँ खत्म होता है जहाँ जनमानस में परिवर्तन नजर आने लगता है। देश-विदेश के करीब सौ पात्रों को समेटकर महाश्वेता ने इस उपन्यास में अपनी विलक्षण प्रतिभा का सबूत दिया है। 'अमृत संचय' में प्रतिकूल स्थितियों में भी जीवन के प्रति जो ललक है और प्रतिरोध की जो चेतना है, उस चेतना पर महाश्वेता की बराबर नजर रही है। गौरों के विरुद्ध ही वह चेतना नहीं थी, बल्कि आजाद भारत में भी प्रतिरोध की चेतना रही है जिसे महाश्वेता पूरे साहस के साथ अभिव्यक्त करती हैं। 'आपरेशन बसाईटुडु', जगमोहन की मृत्यु में महाश्वेता की वेदना और संघर्ष की स्मृति भी संचित है। महाश्वेता इतिहास, मिथक और वर्तमान राजनैतिक यथार्थ के ताने-बाने को संजोते हुए सामाजिक परिवेश की मानवीय पीड़ा को स्वर देती हैं।

'अग्निगर्भ' में महाश्वेता देवी पूछती हैं - जब बटाईदारी-अधिया जैसी घृणित प्रथा में किसान पिस रहे हों, खेतिहर मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी न मिले, बीज-खाद-पानी-बिजली के लाले पड़े हों, उनका अस्तित्व दाँव पर हो, ऐसे में वह सामंती हिंसा के विरुद्ध हिंसा को चुन ले तो क्या आश्चर्य? 'अग्निगर्भ' का संथाल किसान बसाई टुडू किसान-संघर्ष में मरता है। लाश जलने के बावजूद उसके फिर सक्रिय होने की खबर आती है। बसाई फिर मारा जाता है। वह अग्निबीज है और अग्निगर्भ है सामंती कृषि व्यवस्था। 'अग्निगर्भ' उपन्यास में महाश्वेता देवी मानती हैं कि इस धधकते वर्ग-संघर्ष की अनदेखी करनेवालों और इतिहास में इस संधिकाल में शोषितों का पक्ष न लेने वाले लेखकों को इतिहास माफ नहीं करेगा। असंवेदनशील व्यवस्था के विरुद्ध युद्ध, सूर्य के समान क्रोध ही उनकी प्रेरणा है। अग्निगर्भ में उन संघर्षशील लोगों की कथा है जिन्होंने सामाजिक न्याय के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर दिए।

'श्री श्री गणेश महिमा' में एक ओर गणेश की महिमा है तो वहीं बर्बर और हिंसक व्यवस्था के विरुद्ध तनकर खड़े हैं राका दुसाध, नक्सली जुगलकरन, गांधीवादी अभय महतो और बस्तियों से भागकर आई भीड़। 'श्री श्री गणेश महिमा' आज भी बिहार की हकीकत है। यह बिहार के एक गाँव की कहानी है जो अभी भी मध्ययुग के बीहड़ अँधेरों में जी रहा है। उस गाँव में इक्कीसवीं सदी की आहट नहीं सुनाई पड़ रही। वहाँ सवर्णों का राज चलता है। राजपूत मालिक ही तय करते हैं कि निचली जाति के लोग कब गुलाम हों, कब बंधुआ मजदूर और कब सर्वहारा किसान। निचली जाति की औरतों की नियति है सवर्णों की रखैल बनना। ठाकुर मेदिनी सिंह की रखैल लछिमा मेदिनी सिंह के अनाथ बेटे को पाल-पोसकर बड़ा करती है लेकिन गणेश जब दलितों पर बेतरह अत्याचार करता है तो वही लछिमा गणेश को दलितों की उत्तेजित भीड़ के हवाले कर देती है। सवर्णों के निरंकुश शासन के विरुद्ध महाश्वेता उद्घोष करती हैं। 'आंधार मानिक' में उन्होंने बंगाल के सामाजिक जीवन में आए परिवर्तन का चित्र खींचा। महाश्वेता देवी का उपेक्षितों और शोषितों के प्रति लगाव स्थायी और वास्तविक है।

'तारार आंधार' में मध्यवृत्त की ट्रेजेडी, थोड़ी आशा है। सर्कस की पृष्ठभूमि पर लिखा 'प्रेमतारा' प्रेम की कथा है फिर भी उसकी पृष्ठभूमि में सिपाही विद्रोह रहता है। 'अक्लांत कौरव' में महाश्वेता देवी बताती हैं - चुनाव में जब जनपक्षीय राजनीति की विजय होती है और वे सत्ता में भी आते हैं तो वंचितों की यह आकांक्षा जोर मारती है कि अब दिन फिरेंगे। लेकिन सत्तासीन वामपंथी कार्यकर्ताओं के लिए क्रांति-परिवर्तन का अर्थ बदल जाता है। जनकांक्षाएँ धूल खाती हैं और जन-जन में असली परिवर्तनकामी कार्यकर्ताओं की पहचान की प्रक्रिया शुरू होती है। 'अक्लांत कौरव' की कथा छोटी है। लेकिन अपने गर्भ में विस्फोटक तथ्य छिपाए है। वाम राजनीति के दक्षिणी छोर वाले द्वैपायन सरकार पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा बटाईदारों के हित में चलाए गए आपरेशन बर्गा के दरम्यान जागुला गाँव आते हैं। वे सब्जबाग दिखलाकर आदिवासियों की एकता तोड़ना चाहते हैं वहीं ईमानदार इंद्र प्रमाणिक गाँव में काम करने आता है तो स्थानीय कार्यकर्ता उसे नक्सली सिद्ध करते हैं। फिर भी आदिवासी असली हितैषी को पहचान लेते हैं।

शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ निरंतर संघर्ष करने वाले गरीब और समर्पित स्कूल मास्टर की कथा के जरिए साठ-सत्तर के दशक में अपने नक्सल आंदोलन के वैचारिक सरोकारों और लोगों में आती प्रतिरोध की चेतना को लेखिका ने 'मास्टर साब' उपन्यास में दर्शाया है। यह एक जीवनीपरक, विचारोत्तेजक और मार्मिक उपन्यास है। शोषण और दोहन के विरुद्ध जो चेतना जगा रहे थे मास्टर साब, वे अपने ही लोगों के हाथों मारे जाते हैं। मास्टर साब अब इतिहास हो गए हैं। महाश्वेता अनवरत उन्हें खोजती रहती हैं। जिनका कोई नाम नहीं है पर वो अन्याय व शोषण के विरुद्ध जेहाद छेड़ देते हैं। महाश्वेता ने 'हजार चौरासी की माँ' में नक्सल आंदोलन को माँ की नजर से देखा। नक्सल आंदोलन की वे साक्षी रही थीं। जनसंघर्षों ने उनके जीवन को भी परिवर्तित किया और लेखन को भी। 'हजार चौरासी की माँ' उस माँ की मर्मस्पर्शी कहानी है जिसने जान लिया है कि उसके पुत्र का शव पुलिस हिरासत में कैसे और क्यों है।

आदिम जनजातियों, प्रकृतिजीवियों के जीवन को तहस-नहस करने वाले कपटी सभ्य समाज के जीवन की दूसरी विकृतियों को भी महाश्वेता ने निर्वस्त्र किया है। अपने उपन्यास 'नील छवि' में उन्होंने रोचक ढंग से बताया है कि ड्रग्स और ब्लू फिल्में किस तरह समाज को भीतर से खोखला कर रही हैं और कला-जगत, पत्रकारिता और उच्च व निम्न मध्य वर्ग किन विडंबनाओं का शिकार है? पूरी और बुरी तरह उपभोक्ता संस्कृति में जकड़ा समाज किस तरह अपनी विलासिता और महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए सारे मानवीय और नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दे चुका है।

उच्च मध्य वर्ग की विडंबना की तस्वीर उपन्यासकार ने पत्रकार दंपति के बीच चंद संवादों में ही पेश कर दी है। पत्नी जलि अपने पति अभ्र से कहती है, 'तुम्हारे साथ अब मैं नहीं रह सकती और मुझे भी लगता है कि मेरे बिना तुम्हारा काम चल जाएगा। पति कहता है कि ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं। जलि, मैं क्या तुम्हारे कैरियर के रास्ते में बाधा हूँ? सच बताना। जलि कहती है, 'तुम कैरियर के रास्ते में बाधा नहीं हो पर वरुण उसमें बहुत मददगार है वरना पाँच साल में ही एक मामूली कापी राइटर से एक बड़े एक्जीक्यूटिव के पद पर कैसे पहुँचती? इस तरह जलि अपने पति को छोड़ वरुण के साथ रहने लगती है पर वरुण के साथ भी उसकी ज्यादा दिन नहीं निभती। जलि ने वरुण का सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल किया। इसके बाद अभ्र और जलि की बेटी सेऊंती ड्रग्स की दुनिया में फँस जाती है। फिर तो उपन्यास में जिज्ञासा और उत्तेजना का अनुपात काफी बढ़ जाता है। बतौर बानगी, 'ड्रग्स खिलाकर पहले उसकी लत लगाओ फिर अचानक ड्रग्स बंद। तब तरुण-तरुणियाँ पैर पड़ेंगे, रोएँगे और जानवरों की तरह चीखेंगे। उस समय वे ड्रग्स के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाएँगे। विकृत यौनाचार चलाओ, मैं तस्वीरें खींचता जाऊँ।' उपन्यास के इन चंद संवादों से सभ्य समाज की हकीकत नंगी हो जाती है पर इससे महाश्वेता की आस्था डिग नहीं जाती क्योंकि इसी उपन्यास में बेटी के लिए अभ्र और जलि फिर मिलते हैं और बेटी को स्थायी रूप से पारिवारिक और सामाजिक जीवन से जोड़ने का संकल्प करते हैं। महाश्वेता की आस्था नहीं डिगने का एक कारण तो यह है कि उन्हें लगता है कि विकृतियों की शिनाख्त हो रही है तो यही आश्वासन भी है वे दूर की जा सकती हैं।

महाश्वेता देवी ने अपने कई उपन्यासों की तरह अपनी अनेक कहानियों में भी सदियों से मुख्यधारा से बाहर धकेली गई आदिवासी अस्मिता के प्रश्न को शिद्दत से उठाया है। महाश्वेता की कई कहानियाँ आदिवासियों की प्रामाणिक संघर्ष गाथाएँ हैं बल्कि उन्हें महागाथाएँ कहना ज्यादा उचित होगा। इन महागाथाओं में आदिवासी समाज की चिंता कदाचित पहली बार बेचैनी के साथ प्रकट हुई। अपनी कथाकृतियों में हाशिए पर धकेले गए आदिवासी को नायक बनाकर महाश्वेता देवी हिंदी में प्रेमचंद तो बांग्ला में ताराशंकर बंद्योपाध्याय और मानिक बंद्योपाध्याय से भी आगे निकल गईं। प्रेमचंद और ताराशंकर किसान को नायक बना चुके थे तो मानिक बाबू मछुआरों को। उससे काफी आगे जाकर महाश्वेता ने जनजातियों और आदिवासियों के विद्रोही नायकों को अपनी कथाकृतियों का नायक बनाया। महाश्वेता अपनी कहानियों में समाज को शोषण, दोहन और उत्पीड़न से मुक्त कराते संघर्षशील नायकों का संधान करती हैं। इन संघर्षशील आदिवासी नायकों का संधान महाश्वेता की कहानी 'बाढ़' में बागदी के रूप में 'बांयेन' में डोम 'शाम सवेरे की माँ' में पाखमारा 'शिकार' में ओरांव 'बीज' में गंजू 'मूल अधिकार और भिखारी दुसाध' में दुसाध 'बेहुला' में माल या ओझा और 'द्रौपदी' में संथाल के रूप में सहज ही हो जाता है। इनमें गंजू लोगों का काम है - मृत मवेशियों की खाल निकालना। भिखारी दुसाध की जीविका है - घूम घूमकर बकरी चराना। बांयन बन जाने के पहले चंडी का परिवारिक काम था - श्मशान में मुर्दे गाड़ना। पाखमारा जरा ब्याध के वंशधर हैं तो डोम श्मशान का मालिक हैं। आदिवासियों का यह तो आनुवांशिक काम हैं यही उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी आदिवासी बनाए रखता है। कुछ लोग तीन-पाँच कर जरूर ऊपर उठकर जिले के लाशघर में काम पा जाते हैं। पर कुछ लोग ही। जैसे 'बांयेन' कहानी में मलिंदर गंगापुत्र श्मशान से ऊपर उठकर जिले में लाशघर में काम पर जाता है और सरकार बाबू के साथ मिलकर लावारिश लाशों के कंकाल के व्यापार में लगता है पर अपने संस्कारों से नहीं उबर पाता। 'बांयेन' कहानी में महाश्वेता देवी अत्यंत मार्मिकता के साथ यह रेखांकित करती हैं कि जो स्वयं मुख्य धारा से निर्वासित हैं, वे स्वंय अपने में से किसी व्यक्ति को समाज से निर्वासित करते हैं तो वह निर्वासित स्त्री मनुष्येत्तर श्रेणी में पहुँच जाती है। तुर्रा यह कि उसे भी वह अपनी नियति मानकर कबूल करती है। चंडी बांयेन बन जाती है तो मलिंदर अपने बेटे भगीरथ से कहता है पहले वह आदमी थी तेरी माँ थी। भगीरथ को किंतु पिता की बात गले नहीं उतरती वह अपनी माँ को मनुष्य ही मानता है बांयेन नहीं। वह बांयेन स्त्री ही एक बड़ी रेल दुर्घटना रोकती है अपनी आहुति देकर तो आदिवासी समाज ठगा रह जाता है और भगीरथ जब देश और शासन के सामने अपना परिचय चंडी बांयेन के पुत्र के रूप में देता है तो कहानी अपने अत्यंत मार्मिक क्षण में पहुँच जाती है।

बांयेन में मलिंदर अपनी जाति से जिस तरह ऊपर उठ जाता है उसी तरह 'शाम सवेरे की माँ' में जटी ने पारिवारिक या आनुवांशिक जीविका के बजाय दूसरा काम चुना पर वे अपने संस्कारों से ऊपर नहीं उठ पाए। 'बेहुला' में भी संस्कार से आदिवासियों को मुक्त करने की आकांक्षा कथाकार में है। 'बेहुला' में संस्कारों की मुक्ति श्रीपद की मृत्यु में होती है।

'बाढ़' में एक पुराना रूपक आता है कि बहुत पहले एक बार बाढ़ में पानी में जात-पात का बंधन बह गया था और धनी लोगों ने आदिवासियों को भरपेट भोजन कराया था। इस व्यंजना की प्रतिष्ठा कदाचित विषमता के बीच समता की स्थापना करने के लिए की गई है। आखिर पेट की ज्वाला कैसे शांत हो? बीज कहानी में दूलन गंजू को लगला है कि जिंदा रहने की चतुराई के बारे में सोचते-सोचते उसे अपने बेटों और पोतों के साथ बात करने का वक्त न मिला।

महाश्वेता की कहानियाँ बताती हैं कि संस्कार असामर्थ्य और डर आदिवासियों के मन और चरित्र पर भी असर डालते हैं। आदिवासियों की जिंदा रहने की प्रणाली बदलती है तो शाम-सबेरे की माँ में जटी का रूपांतरण होता है - ठकुरानी के रूप में और बांयेन रेल दुर्घटना रोकने की भूमिका में अवत्तीर्ण होती है। यही क्रम आगे जाकर प्रतिरोध का जन्म लेता है। द्रौपदी में वह प्रतिरोध संगठित आंदोलन की शक्ल लेता है। महाश्वेता कहती हैं - एक लंबे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्वाला धधक रही है वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी...। महाश्वेता की कई कहानियों के केंद्र में आदिवासी मनुष्य हैं जो समाज की मूलधारा से कटकर जी रहे हैं। ये कहानियाँ लोककथाओं और पुराकथाओं के सहारे कही गई हैं। महाश्वेता देवी के ही शब्दों में मैं पुराकथा पौराणिक चरित्र और घटनाओं को वर्तमान मे परिप्रेक्ष्य में फिर से यह बताने के लिए लिखती हूँ कि वास्तव में लोककथाओं में अतीत और वर्तमान एक अविच्छिन्न धारा के रूप में प्रवाहित होते हैं...।

सन 1984 में प्रकाशित अपने श्रेष्ठ गल्प की भूमिका में महाश्वेता देवी ने लिखा है : साहित्य को केवल भाषा शैली और शिल्प की कसौटी पर रखकर देखने के मापदंड गलत हैं। साहित्य का मूल्यांकन इतिहास के परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। किसी लेखक के लेखन को उसके समय और इतिहास के परिप्रेक्ष्य में रखकर न देखने से उसका वास्तविक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। मैं पुराकथा पौराणिक चरित्र और घटनाओं को वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में फिर से यह बताने के लिए लिखती हूँ कि वास्तव में लोक-कथाओं में अतीत और वर्तमान एक अविच्छिन्न धारा के रूप में प्रवाहित होते हैं। यह अविच्छिन्न धारा भी वायवीय नहीं है बल्कि जात-पांत खेत और जंगल पर अधिकार और सबसे ऊपर सत्ता के विस्तार तथा उसके कायम रखने की पद्धति को केंद्र में रखकर निम्न वर्ग के मनुष्य के शोषण का क्रमिक इतिहास है।

'बांयेन' कहानी में अपनी पत्नी को बांयेन घोषित कर समाज से बहिष्कृत करने में मलिदंर गंगापुत्र को जरा भी संकोच नहीं होता। इस कहानी में महाश्वेता ने बताया है कि जो स्वयं हाशिए के लोग हैं, वे भी अपने समाज से किसी को बहिष्कृत करते हैं तो निर्वासित व्यक्ति उसे भी नियति मानकर कबूल कर लेता है। और जिसे समाज से बहिष्कृत किया गया है, वह बांयेन औरत ही एक बड़ी रेल दुर्घटना रोकती है आत्माहुति देकर। तब श्मशान के डोमों का समाज ठगा रह जाता है। 'द्रोपदी' कहानी में दोप्दी मेंझेन को पुलिस प्रशासन विश्वासघाती मजदूरों के साथ साजिश कर जंगल से पकड़कर सेनापति के कैंप में ले जाता है, द्रोपदी अपने दोनों घायल स्तनों से सेनानायक को धक्का देती है और पहली बार सेनापति को निःशस्त्र टारगेट के सामने खड़ा होने से डर लगता है, भयंकर डर। द्रौपदी कहानी में जंगल और प्रशासन का संघर्ष है, उसी तरह 'शिकार' कहानी का आधार भी जंगल ही है। 'द्रौपदी' और 'शिकार' एक ही कथा के दो पहलू हैं। द्रौपदी का रक्त विशुद्ध है, कोई मिलावट नहीं। द्रौपदी को अपने पुरखों पर गर्व हुआ जो अपनी स्त्रियों के खून पर काली कुचिला का विष लेकर पहरा देते थे। 'शिकार' कहानी में मेरी उरांव का रक्त साहबी रक्त है। तहसीलदार सिंह द्वारा लगातार पीछा किए जाने से मेरी का धैर्य खत्म होने लगा था। रास्ते में एक बार तहसीलदार ने मेरी का हाथ जोर से पकड़ लिया और बोला, ''आज तुझे नहीं छोड़ूँगा।'' मेरी को उस दिन तहसीलदार एक जानवर जैसा लगा। मेरी ने यह कहकर उससे पिंड छुड़ाया - आज नहीं 'खड्ड के पास होली के दिन।' तहसीलदार मान गया और होली के दिन उसने तहसीदार को खड्ड में धकेल दिया। सबसे बड़े जानवर का शिकार करने के बाद अन्य चौपायों के बारे में जो डर मेरी उरांव के रक्त में समाया था, वह अब पूरी तरह गायब था।

'द्रौपदी', 'बीज' और 'शिकार' कहानियों में आदिवासियों में प्रतिरोध की चेतना जाग्रत होती दिखाई पड़ती है। आदिवासी अब लड़ाई के मैदान में उतर गए हैं। 'द्रौपदी' में वह प्रतिरोध संगठित आंदोलन का रूप लेता है। महाश्वेता ने अपने कहानी संग्रह 'भारतवर्ष तथा अन्य कहानियाँ' में घुमंतू मानी जानेवाली जनजातियों की लड़ाई जीतने की जंग दर्ज की है। संग्रह की पहली कहानी 'आखिरी शमानिन' में ही घुमंतू बनने का चित्र खींच दिया गया है - किसी जमाने में उड़ीसा में पहाड़ी सबरा उपजाति निवास करती थी। इस उपजाति के लोग सपने में देवता के आदेश पर उतालन आँकते थे। पुरुष या स्त्री शामिन या शमानिन सभी को उतालन आँकने का अधिकार होता है। कहानी बताती है कि किस तरह ठेकेदार आदिवासी मजदूरों को दिवास्वप्न दिखाकर सुदूर मजदूरी कराने ले जाते हैं और एक जगह से दूसरी जगह मजदूरी के लिए ले जाए जाने से वे आदिवासी किसी जगह को अपना नहीं बना पाते और इसकी टीस उनके भीतर हमेशा बनी रहती है। 'घहराती घटाएँ' और 'ईंट के ऊपर ईंट' जैसे कहानी संकलनों में वर्तमान समाज व्यवस्था में मनुष्य के संघर्ष का बहुत ही समर्थ चित्रण किया है महाश्वेता ने। 'मूर्ति' और उसके बाद की कहानी पुस्तकें भी संघर्ष की अगली कड़ियाँ हैं। कहना न होगा इस संघर्ष से महाश्वेता का सरोकार बहुत गहरा है। संघर्ष का स्वर कहीं मार्मिक है तो कहीं तीखा। 'जगमोहन की मृत्यु' कहानी की ये पंक्तियाँ उदाहरण हैं - पुलिस ने हमारी बेटियों की इज्जत ले ली। कहने से कोई मानता नहीं। महाजन बेगार लेता है, कानून नहीं मानता।' 'जंगल में गाय चराता हूँ। ईंधन बटोरता हूँ। हमारा हक है। महाजन पानी नहीं देता। कुआँ पंचायती है।'

महाश्वेता की कहानियों में सामंती ताकतों के शोषण, उत्पीड़न, चल-छद्म के विरुद्ध पीड़ितों और शोषितों का संघर्ष अनवरत जारी रहता है। संघर्ष में वह मार भी खाता है पर थककर बैठ नहीं जाता। क्रूरता और बर्बरता में भी पीड़ित तबका टिके रहता है। कई उपन्यासों की तरह उनकी कहानियों में भी आदिम जनजातीय स्रोतों से प्राप्त कथा तो है ही, जीवन और समाज के दूसरे ज्वलंत मुद्दों को भी उनहोंने साधिकार स्पर्श किया है। 'रुदाली' कहानी में महाश्वेता ने औरत की अस्मिता का प्रश्न उम्दा तरीके से उठाया तो 'अक्लांत कौरव' में विकास और छद्म प्रगतिवाद की तीखी आलोचना की।

पलामू के बंधुआ मजदूरों के बीच काम करते हुए महाश्वेता ने कई तथ्य एकत्रित किए थे। उसी के आधार पर निर्मल घोष के साथ मिलकर उन्होंने 'भारत के बंधुआ मजदूर' नामक पुस्तक लिखी थी। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आदिवासी अंचलों के सुख-दुख के बारे में उन्होंने समय-समय पर जो लिखा वे भी संकलित होकर पुस्तक रूप में छाप चुकी हैं - 'डस्ट आन रोड'। महाश्वेता की टिप्पणियों के इस संकलन को मैत्रेई घटक (महाश्वेता के छोटे भाई) ने संपादित किया है।

हाल के वर्षों से लेखन ही महाश्वेता की आजीविका का एकमात्र साधन रहा है। इसलिए उनका पेशेवर लेखिका होना स्वाभाविक है। लेकिन समान निष्ठा से ही उन्होंने लघु पत्रिकाओं में भी लिखा है। लघु पत्रिकाओं के लिए उन्होंने संघर्ष भी किया। उन्होंने अपने संपादन में निकालने वाली 'वर्तिका' में छोटे पत्रों की तालिका भी नियमित छापी। लेकिन महाश्वेता आज छोटे पत्रों तक सीमित नहीं। महाश्वेता की सृजनशीलता, उनकी जीवनयापन प्रणाली, पत्रकारिता और वर्तिका का संपादन - सबका मूल्यबोध एक है। इसी तरह वर्तिका का निजी चरित्र समझा जा सकता है। महाश्वेता बचपन से ही काम करते चलाने में विश्वास करती हैं। यह संस्कार उन्हें शांतिनिकेतन में मिला था। सुबह उठने से लेकर रात को सोने जाने तक काम में व्यस्त रहने का संस्कार जीवन की सांध्य बेला में भी यथावत है। इसके लिए उन्हें कठोर नियमों का पालन करते रहना पड़ा है। यह भूल जाना पड़ा है कि आराम भी कोई चीज है। उन्होंने पूरी तरह आमोद-प्रमोद का विसर्जन किया है। स्वभाव, चिंतन, आचरण, खान-पान में कोई फ्रिल नहीं। जिनमें है, वे पसंद नहीं। प्रशंसा या पुरस्कारों से उन्हें प्रसन्नता की अनुभूति नहीं होती। नया कपड़ा पहनना पसंद नहीं। कभी लोभी और पेटू थीं पर अब खान-पान में भीतरी पसंद नहीं। भगवान पर भरोसा नहीं पर इस बात के लिए महाश्वेता हमेशा सचेष्ट रही हैं कि अपने लेखन, व्यवहार या काम से किसी का अहित नहीं हो।

1980 में उन्होंने पत्रिका 'वर्तिका' का संपादन शुरू किया था। उसके पहले उनके पिता मनीष घटक उसे संपादित करते थे। पिता का 1979 में निधन हो गया तो महाश्वेता ने पत्रिका का चरित्र ही बदल डाला। वर्तिका एक ऐसा मंच बन गया जिसमें छोटे किसान, खेत मजदूर, आदिवासी, कारखानों में काम करने वाले मजदूर, रिक्शा चालक अपनी समस्याओं और जीवन के बारे में लिखते। अब भी लिखते हैं। 'वर्तिका' में मेदिनीपुर के लोधा और पुरुलिया के खेड़िया शबर आदिवासियों ने बहुत कुछ लिखा। इसके जरिए आदिवासियों ने जीवन में पहली बार किसी प्रकाशन में लिखा। पहली लोधा स्नातक लड़की चुनी कोटाल ने भी 1982 में वर्तिका में लिखा था अपने जीवन संघर्ष के बारे में। इस तरह वर्तिका के जरिए महाश्वेता ने बांग्ला में वैकल्पिक साहित्यिक पत्रकारिता की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किए।

महाश्वेता ने बंधुआ मजदूर, किसान, फैक्टरी मजदूर, ईंट भट्ठा मजदूर, आदिवासियों को जमीन से बेदखल किए जाने और बंगाल के हरेक आदिवासी समुदाय पर वर्तिका के विशेष अंक निकाले। उन्होंने बांग्लादेश और अमेरिका के आदिवासियों पर भी विशेष अंक निकाले। वर्तिका ने अपनी गहरी संपादकीय दृष्टि और संपादकीय विवेक का परिचय दिया। मध्य वर्ग के एक्टिविस्ट भी इसमें लिखते हैं। संपादक को अकादमिक लेख पसंद नहीं हैं क्योंकि वास्तविक जीवन के साथ उन लेखों का खास मेल नहीं होता। इसीलिए महाश्वेता तथ्यों, आँकड़ों, सर्वेक्षणों पर आधारित लेख ही छापती हैं। सर्वेक्षणों के लिए वे प्रश्नावलियाँ बनाती हैं और खेतिहर मजदूरों, छोटे किसानों, आदिवासी समूहों, रिक्शा चालकों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों से लेकर गाँवों के आम सामाजिक, आर्थिक जीवन पर सर्वेक्षण कराती हैं। यह अवदान क्या कम महत्त्वपूर्ण है?

कई दूसरे पक्ष भी हैं उनके व्यक्तित्व के। लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता, रिपोर्टर और छोटे-छोटे वंचित शोषित लोगों के समूहों की संगठक - ये सभी वे एक साथ हैं क्योंकि उनके व्यक्तित्व के ये सभी आयाम एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। लेखिका के रूप में तो उनका अवदान व्यापक है ही। संख्या ही नहीं साहित्यिक दृष्टि से भी। 'कवि वैद्यघोटी गइनेर जीवन उ मृत्यु' में महाश्वेता ने निचली जाति के युवक के मानवाधिकार हासिल करने के संघर्ष को वाणी दी है।

दरअसल दक्षिण बिहार, बंगाल, उड़ीसा, गुजरात व महाराष्ट्र की जनजातियों के बीच वर्षों काम करने के अनुभव ने महाश्वेता को पैनी दृष्टि और ऐसी शक्ति दी जिससे वे आधुनिक भारतीय जीवन के पीड़ादायक मुद्दों का अनुभव कर सकीं और अपनी कृतियों में अभिव्यक्त कर सकीं। आदिवासियों के जीवन और वृत्तांत के माध्यम से उन्होंने इतिहास, मिथक और वर्तमान राजनैतिक यथार्थ के ताने-बाने को सँजोते हुए सामाजिक परिवेश की माननीय पीड़ा को स्वर दिया। भारतीय आदिवासी समाज और दूसरे उपेक्षित-वंचित तबकों के बारे में ही उन्होंने ज्यादा लिखा है। अपनी ढाई सौ पुस्तकों के जरिए उन्होंने जीवन के विविध रंगों को उकेरा। और तीन दशकों से ज्यादा समय से उन्होंने आदिवासियों के बीच फील्ड वर्क ही नहीं किया बल्कि पलामू के बंधुआ मजदूरों, मेदिनीपुर के लोधा और पुरुलिया के खेड़िया शबर आदिवासियों के जीवन को अपनी लेखनी के जरिए वाणी भी दी। जाहिर है महाश्वेता के कर्म और कथ्य में रत्ती भर फर्क नहीं है। महाश्वेता की कृतियाँ पढ़कर ही रचना कर्म के महत्व और लेखक के सामाजिक सरोकार को समझा जा सकता है।

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