कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद

दक्षिण भारत के हिन्दीतर क्षेत्र में विगत २ दशक से हिन्दी साहित्य के संरक्षण व संवर्धन में जुटी संस्था. विगत २२ वर्षों से निरन्तर मासिक गोष्ठियों का आयोजन. ३०० से अधिक मासिक गोष्ठियाँ संपन्न एवं क्रम निरन्तर जारी...
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Monday, 4 December 2017

किस को आती है मसिहाई किसे आवाज़ दूँ


जोश मलीहाबादी जिनका जन्म नाम शब्बीर हसन खां था, का जन्म 5  दिसम्बर 1898 को मलीहाबाद में जो कि उत्तर प्रदेश में लखनऊ ज़िले की एक पंचायत है, में हुआ था. ये ग़ज़ल और नज़्मे तखल्लुस 'जोश' नाम से लिखते थे और अपने जन्म स्थान का नाम भी आपने अपने तखल्लुस में जोड़ दिया और इस तरह इनका नाम जोश मलीहाबादी हो गया ।

जोश मलीहाबादी सेंट पीटर्स कॉलेज आगरा में पढ़े और वरिष्ठ कैम्ब्रिज परीक्षा 1914 में उत्तीर्ण की। और साथ ही साथ अरबी और फ़ारसी का अध्ययन भी करते रहे। 6 माह रविंद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में भी रहे। परन्तु 1916 में पिता बशीर अहमद खान की मृत्यु होने के कारण कॉलेज की आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सके।

जोश और हैदराबाद से जुड़ा एक मज़ेदार वाकया ये है कि 1925 में जोश ने 'उस्मानिया विश्वविद्यालय' हैदराबाद रियासत में अनुवाद की निगरानी का कार्य शुरू किया। परन्तु उनका यह प्रवास हैदराबाद में ज्यादा दिन न रह सका। अपनी एक नज़्म जो कि रियासत के शासक के ख़िलाफ़ थी जिस कारण से इन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया गया। इसके तुरंत बाद जोश ने पत्रिका, कलीम (उर्दू में "वार्ताकार") की स्थापना की, जिसमें उन्होंने खुले तौर पर भारत में ब्रिटिश शासन से आज़ादी के पक्ष में लेख लिखा था, जिससे उनकी ख्याति चहुं ओर फैल गयी और उन्हें शायर-ए-इन्कलाब कहा जाने लगा और इस कारण से इनके रिश्ते कांग्रेस विशेषकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मजबूत हुए। भारत में ब्रिटिश शासन के समाप्त होने के बाद जोश आज-कल प्रकाशन के संपादक बन गए।

जोश उर्दू साहित्य में उर्दू पर अधिपत्य और उर्दू व्याकरण के सर्वोत्तम उपयोग के लिए जाने जाते हैं। इनका पहला शायरी संग्रह सन 1921 में प्रकाशित हुआ जिसमें शोला-ओ-शबनम, जुनून-ओ-हिकमत, फ़िक्र-ओ-निशात, सुंबल-ओ-सलासल, हर्फ़-ओ-हिकायत, सरोद-ओ-खरोश और इरफ़ानियत-ए-जोश शामिल है। फ़िल्म निर्देशक डब्ल्यू. ज़ी. अहमद की राय पर इन्होंने शालीमार पिक्चर्स के लिए गीत भी लिखे।

उर्दू लिखने और बोलने के तरीके को लेकर वो बड़े पाबंद थे, उर्दू शब्दों का ग़लत उच्चारण करने पर उन्होंने बड़े-बड़ों को नहीं बख़्शा । जोश के पोते फ़र्रुख़ जमाल लिखते हैं कि एक बार पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खाँ ने उन्हें ख़ुश करने के लिए कहा कि आप बहुत बड़े आलम हैं. जोश ने फ़ौरन जवाब दिया सही लफ़्ज़ आलिम है न कि आलम. इस पर अयूब नाराज़ हो गए और उन्होंने आदेश दिया कि जोश को दी गई सीमेंट एजेंसी उनसे वापस ले ली जाए और ऐसा ही हुआ.

भाषा को लेकर उनकी सनक इस हद तक थी कि एक बार उन्होंने सरेआम साहिर लुधियानवी को उनकी मशहूर नज़्म 'ताजमहल' में एक शब्द ग़लत उच्चारित करने के लिए टोका था.

जवाहरलाल नेहरू को जब उन्होंने अपनी एक किताब दी तो उन्होंने कहा,"मैं आपका मशकूर हूँ." जोश ने उन्हें फ़ौरन टोका, "आपको कहना चाहिए था शाकिर हूँ."

जोश फ़िराक़ गोरखपुरी से एक साल छोटे थे, लेकिन तब भी फ़िराक उन्हें अपना गुरु मानते थे. फ़िराक़ ने एक बार एक टेलिविजन इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि उन्हें अपनी ग़ज़ल पूरी करने के लिए एक शब्द नहीं मिल रहा था. वो बहुत झिझकते हुए जोश के पास गए थे. जोश के मुंह से वो शब्द एक रत्न की तरह बाहर आया था.

1956 में जोश बिना किसी को बताए पाकिस्तान चले गए. जाने से पहले वो नेहरू से सलाह मांगने गए. नेहरू ने कहा कि ये आपका निजी मामला है, लेकिन आप फिर भी मौलाना आज़ाद से सलाह ले लीजिए. उनका सोचना था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है जहाँ हिंदी भाषा को ज्यादा तवज्जो दी जायगी न की उर्दू को, जिससे उर्दू का भारत में कोई भविष्य नहीं है। पकिस्तान जाने के बाद ये कराची में बस गए और आपने मौलवी अब्दुल हक के साथ में "अंजुमन-ए-तरक़्क़ी-ए-उर्दू" के लिए काम किया।

मौलाना ने कहा कि यूँ तो देशप्रेम की कोई क़ीमत नहीं होती, लेकिन अगर होती भी है तो भी आपको उसकी क़ीमत से कहीं ज़्यादा मिल चुका है. बहरहाल जोश माने नहीं और पाकिस्तान चले गए. वो कहते हैं, "दरअसल जोश पर उनके बेटों का बहुत दबाव था. नेहरू ने उन्हें सलाह दी थी कि वो अपने बेटों को पाकिस्तान भेज दें और ख़ुद यहीं रहें, लेकिन उनकी पत्नी ने कहा कि वो अपने बेटों और पोतों के बिना यहाँ नहीं रह पाएंगी."

देहलवी के अनुसार, "फिर पाकिस्तान के लोगों ने भी उन्हें सब्ज़बाग दिखाए कि उनके पाकिस्तान पहुंचते ही उन्हें एक हवेली दे दी जाएगी. मौलाना आज़ाद इससे इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने कहा मेरे ज़िंदा रहते तुम भारत में क़दम नहीं रखना और ऐसा ही हुआ. मौलाना आज़ाद की मौत के बाद ही जोश पहली बार भारत वापस आए."

भारत से पाकिस्तान जा बसने के बाद जोश मलीहाबादी तीन बार भारत आए थे. एक बार मौलाना आज़ाद की मौत पर, दूसरी बार जवाहरलाल नेहरू के मरने पर और तीसरी बार 1967 में.

जोश बहुत ही हाज़िर जबाब भी थे. एक बार जोश मलीहाबादी पाकिस्तान में मशहूर आर्टिस्ट ज़िया मोहिउद्दीन और कराची के जल विभाग के प्रमुख के साथ एक टीवी शो कर रहे थे. ज़िया ने उनसे सवाल किया, "जोश साहब, आपके इलाक़े में पानी की तो कोई समस्या नहीं है?

जोश बोले, "भाई पानी तो कभी-कभी आता है, लेकिन बिल बाक़ाएदगी से हर माह की पहली को आ जाता है. उस्मान साहब (बिजली विभाग के प्रमुख) का बस चले तो करबला में इमाम हुसैन को भी पानी का बिल दे देते."

दिल्ली के मशहूर यूनाइटेड कॉफ़ी हाउस के मालिक प्रेम मोहन कालरा एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं. एक बार उनके दोस्तों ने उन्हें यूनाइटेड कॉफ़ी हाउस कॉफ़ी पीने के लिए बुलाया. कॉफ़ी और सैंडविच खाने के बाद जोश शौचालय चले गए. जब वो वापस आए तो उनके सारे दोस्त नदारत हो चुके थे. बैरे ने बिल जोश के सामने पेश किया. जोश के पास बिल देने लायक पैसे नहीं थे. मैनेजर ने कहा कि इसके एवज़ में आपको अपनी शेरवानी गिरवी रखनी पड़ेगी. जोश ने बहुत कहा, लेकिन मैनेजर नहीं माना. जोश को अपनी शेरवानी उतारनी पड़ी. इत्तेफ़ाक से उस दिन उन्होंने शेरवानी के नीचे कुछ नहीं पहना था. वो सिर्फ़ बनियान और पायजामा पहने कॉफ़ी हाउस से बाहर निकल रहे थे कि उसके मालिक किशनलाल कालरा अंदर घुस रहे थे. उन्होंने जोश को पहचाना और पूछा हुज़ूर आप यहाँ कैसे? उन्होंने किशनलाल को पूरी कहानी सुनाई. उन्होंने उनकी शेरवानी वापस दिलवाई और मैनेजर को बहुत डांटा.वो उन्हें अपने घर ले गए और उनसे कहा कि वो जब तक चाहें वहाँ रह सकते हैं.

हर दिसंबर को किशनलाल एक मुशायरे का आयोजन करते थे. उसमें जोश के अलावा फ़िराक़, साहिर लुधियानवी, महेंदर सिंह बेदी और कैफ़ी आज़मी जैसे शायर आते थे. पंडित नेहरू उस मुशायरे में ज़रूर आते थे. मुशायरे के बाद चुनिंदा स्कॉच, शामी क़बाब और लज़ीज़ खाना खिलाया जाता था.

जगजीत सिंह ने जोश मलीहाबादी के कई ग़ज़ल और नज़्मों को अपनी आवाज़ दी. 1954 में उन्हें भारत सरकार की तरफ से पद्म भूषण दिया गया. 22 फरवरी 1982 को पाकिस्तान में उनका देहांत हो गया.



दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैं ने तुझे याद किया

इस का रोना नहीं क्यूँ तुम ने किया दिल बर्बाद
इस का ग़म है कि बहुत देर में बर्बाद किया

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किस को आती है मसिहाई किसे आवाज़ दूँ
बोल ऐ ख़ूं ख़ार तनहाई किसे आवाज़ दूँ

चुप रहूँ तो हर नफ़स डसता है नागन की तरह
आह भरने में है रुसवाई किसे आवाज़ दूँ

उफ़्फ़ ख़ामोशी की ये आहें दिल को बरमाती हुई
उफ़्फ़ ये सन्नाटे की शेहनाई किसे आवाज़ दूँ


- प्रवीण प्रणव

Tuesday, 11 April 2017

ऐसे मन लै जोगी खेलै : गुरु गोरखनाथ

परंपरा कनफटे जोगियों की

पुरानी रोमांटिक प्रणय-गाथाओं से लेकर आधुनिक सनसनीखेज मीडिया-कथाओं तक में एक रोचक रूढि की तरह ध्यान खींचने वाले ‘कनफटे जोगी’ असल में नाथ-पंथ के अनुयायी हठयोगी होते हैं. नाथ-पंथ और  ‘हठयोग’ का प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ को माना जाता है जो हिंदी के आदिकाल के सर्वाधिक प्रखर कवियों में अग्रणी हैं. गुरु गोरखनाथ के जन्म और मृत्यु की निश्चित तिथियाँ ज्ञात नहीं हैं, लेकिन अलग-अलग इतिहासकारों के हवाले से इतना तो निश्चित रूप से समझा जा सकता है कि वे नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच किसी समय विद्यमान थे. प्राच्य विद्या ग्रंथ संग्रहालय, चेन्नई में उपलब्ध ग्रंथ ‘चोलनपूर्व पट्टयम’ तथा कोयम्बत्तूर में प्राप्त शिलालेखों से पता चला है कि कोयंबत्तूर से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित उडुमलैपेट्टै नामक नगर (जिसका पुराना नाम चंद्रगिरि है) गोरखनाथ का जन्मस्थल है.

क्या है हठयोग?
गुरु गोरखनाथ ने ‘सहज योग’ के विकारों को पहचान कर अपने ‘हठयोग’ की स्थापना की. इस मार्ग को ‘हठयोग’ के अलावा नाथ-संप्रदाय, नाथ-पंथ, सिद्ध-मत, सिद्ध-धर्म, योग-मार्ग, योग-संप्रदाय, अवधूत-मत और अवधूत-संप्रदाय जैसे नामों से भी जाना जाता है. दरअसल सहज योग में पंच मकार (मांस, मत्स्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन) की स्वीकृति के कारण विकृति आ गई थी. गुरु गोरखनाथ ने इस लोक-विरुद्ध स्थिति को पहचाना और विशेष रूप से नारी-भोग को साधना का अंग बनाने का दृढ़ता से खंडन किया और हठयोग के रूप में ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा की. यहाँ यह भी जान लें कि गोरखनाथ का योगमार्ग महर्षि पतंजलि के योगमार्ग से भिन्न है क्योंकि पतंजलि के ग्रंथ ‘योगसूत्र’ में नाड़ीशोधन, योगमुद्रा, कुंडलिनी शक्ति का जागरण और शिवशक्ति की समरसता आदि का उल्लेख नहीं मिलता, जिनका हठयोग में सबसे अधिक महत्त्व है.
गोरखनाथ और उनका पंथ
नाथ संप्रदाय के हिंदी कवियों के रूप में यों तो गोरखनाथ, चौरंगीनाथ, गोपीचंद, चुणकरनाथ, भरथरी और जालंध्रीपाव का उल्लेख किया जाता है लेकिन वस्तु और अभिव्यक्ति की मौलिकता की दृष्टि से इनमें गोरखनाथ ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. गुरु गोरखनाथ या गोरक्षनाथ को मध्यकालीन भारतीय पुनर्जागरण के संदर्भ में उन्हें शंकराचार्य के बाद दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है. उनके द्वारा चलाए गए पंथ को ‘गोरखपंथ’ कहा जाता है. हमारी मान्यता तो यह है कि विकृति पर सीधे-सीधे अक्खड़ शब्दों में चोट करने की बहुचर्चित प्रवृत्ति कबीरदास ने गुरु गोरखनाथ से ही विरासत में पाई है. उल्लेखनीय है कि ‘ज्ञानवेट्टीयान’ नामक तमिल ग्रंथ में भी गोरखनाथ को मध्यकालीन भारत का अद्वितीय रहस्यवादी सिद्ध, धर्मगुरु और राष्ट्रनायक बताया गया है. ‘गोरखनाथ’ या ‘गोरक्षनाथ’ उनका  दीक्षानाम है. उनका दीक्षापूर्व नाम ‘पशुपति’ माना जाता है.
गुरु गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 40 बताई जाती है जिनमें से ‘गोरखबानी’ के संपादक डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने 14 को ही प्रामाणिक माना है. ये हैं – (1) सबदी, (2) पद, (3) प्राणसंकली, (4) सिस्यादरसन, (5) नरवैबोध, (6) अभैमात्रा जोग, (7) आतम-बोध, (8) पंद्रह तिथि, (9) सप्तवार, (10) मछींद्र गोरख बोध, (11) रोमावली, (12) ज्ञानतिलक, (13) ज्ञान चौंतीसा, (14) पंचमात्रा.
गोरखनाथ ने अपने समय में प्रचलित कई सारे संप्रदायों का विलय करके नाथपंथ या गोरखपंथ चलाया, इसलिए उनकी बानियों  में उन संप्रदायों के विचारों की छाया भी दिखाई देती है. उनके समय में शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन और वैष्णव योगमार्ग प्रचलित थे. इन सबको अपने युग के संदर्भ में  नई दिशा देते हुए और वर्णव्यवस्था तथा जातिभेद का खंडन करते हुए गोरखनाथ ने अपनी बानियों में गुरु महिमा, इंद्रिय संयम, प्राण साधना, वैराग्य, मनःसाधना, कुंडलिनी जागरण और शून्य समाधि की विशद चर्चा की. इन सबमें उन्होंने नीति और साधना पर बल दिया तथा हठयोग की प्रतिष्ठा की : नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा./ ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा.अभिप्राय यह है कि वैष्णव महाप्रसाद और सहजयानी पंचमकार दोनों ही जिसे विचलित न कर सकें, ऐसे मन वाला योगी ही अपने भीतर बसे आनंद के भंडार में विहार करता है.
कहने की ज़रूरत नहीं की गोरखपंथी हठयोग में सांसारिक आकर्षण को हठपूर्वक रोकने के लिए शक्तिरूपा कुंडलिनी को जगाकर शिव के निवास सहस्रार चक्र में ले जाने की साधना की जाती है. कुंडलिनी साधना के नाम पर स्त्री-पुरुष-समागम के बहाने व्यभिचार को बढ़ावा देने वालों की गुरु गोरखनाथ ने कठोर शब्दों में निंदा की  तथा ‘हठ’ साधना को  ह अर्थात सूर्य और ठ अर्थात चंद्रमा की नाड़ियों के संयोग की साधना के रूप में प्रचारित किया. इस साधना का आधार ब्रह्मचर्य है जो भोग द्वारा समाधि के वाममार्ग का विरोधी है.
योगमार्ग की प्राचीनता
वास्तव में, एक साधना पद्धति के रूप में योग मार्ग बहुत पुराना है और एक प्रकार से गुरु गोरखनाथ ने उसका जीर्णोद्धार किया. योग की प्राचीनता के सबसे पुराने प्रमाण सिंधुघाटी सभ्यता के काल में प्राप्त होते हैं. यह सभ्यता आर्य और द्रविड कही जाने वाली दोनों ही सभ्यताओं की विशिष्टताओं से युक्त है. यदि द्रविड-आर्य-संघर्ष की पश्चिमी इतिहासकारों की कपोल कल्पना के स्थान पर आर्य-द्रविड-समन्वय की खोज करनी हो तो यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है कि वर्तमान सामासिक हिंदू धर्म के बहुत से तत्व सिंधु घाटी सभ्यता की देन हैं. सिंधु सभ्यता की मूर्तियों का विवेचन करते हुए डॉ. नंजुंडन ने यह प्रतिपादित किया है कि उस समय योग की प्रतिष्ठा थी तथा योगमुद्रा धारण किए हुए योगियों की मूर्तियों का प्रचलन था. ऐसी योग मुद्राओं में मूर्तियों की प्राप्ति सिद्ध करती है कि उस अतीत काल में शिव-पशुपति योगियों के आराध्य माने जाते थे और उनके उपासक योगी जन समाज में थे.  इस दृष्टि से योग-विज्ञान को सिंधु सभ्यता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन कहा जाना चाहिए. योग विज्ञान की यह धारा वेदों में भी उपलब्ध है. ऋग्वेद में वर्णित केशिन मुनि में योगी के लक्षण हैं. कुछ मंत्रद्रष्टा ऋषि अवश्य ही योग के रहस्यों से परिचित रहे होंगे. अथर्ववेद में तो पूर्ण विकसित योग प्रणाली का स्वरूप प्राप्त होता है जिसमें प्राण और अपान वायु को वश में करने के लिए प्राणायाम की महत्ता स्वीकार की गई है. विश्व के धारक और रक्षक के रूप में प्राण को आरण्यकों में सर्वत्र व्याप्त तथा आयु का कारण माना गया है. उपनिषदों में भी योगमार्ग का निरूपण मिलता  है. कठोपनिषद और तैत्तिरियोपनिषद में सर्वप्रथम ‘योग’ शब्द का पारिभाषिक अर्थ में प्रयोग हुआ है और यह अर्थ है चित्त को विषयों से हटाकर आत्मा में लीन कर देना. श्वेताश्वतरोपनिषद की प्रतिष्ठा शैव योग के प्रतिपादक प्राचीनतम उपनिषद के रूप में है. इस उपनिषद में ध्यानयोग की विधि और उसके महत्व का उद्घाटन किया गया है तथा आसन, प्राणायाम आदि योग के अन्य अंगों की भी महत्ता स्पष्ट की गई है. मैत्रेय उपनिषद में खेचरी मुद्रा का भी परिचय उपलब्ध है, जबकि इसी के समकालीन अर्थात ईसा के दो शताब्दी इधर या उधर रचित चूलिकोपनिषद में सेश्वरयोग का विवेचन है. आठवीं शताब्दी के पूर्व रचित ‘योगोपनिषद’ में प्रतिपादित विषय का गोरखनाथ रचित ‘सिद्ध सिद्धांत पद्धति’ से आश्चर्यजनक साम्य है. ‘ध्यान बिंदु’ और ‘नाद बिंदु’ उपनिषदों तथा ‘मंडल ब्राह्मण’ के अनेक श्लोकों का भी गोरखनाथ की रचनाओं पर काफी असर दिखाई देता है. गोरखनाथ की योग प्रणाली इस परंपरा का ही समय के अनुकूल परिवर्तित और परिवर्द्धित रूप मात्र है.
गोरखपंथ की मौलिकता
यहाँ यह बताना जरूरी है कि योग की परंपरा का विस्तार होने के बावजूद गोरख-दर्शन अनुकरण या नक़ल नहीं है. बल्कि गोरखनाथ जिस निर्णय पर पहुँचे वह पूर्णतः उनकी स्वानुभूति पर आधारित है; अतः सर्वथा मौलिक है. गोरख-दर्शन में परमसत्ता को अनेक अवस्थाओं से युक्त अंड-पिंड के रूप में सर्वत्र विद्यमान माना गया है तथा अद्वयवाद को इस योग मार्ग का मूल तत्व सिद्ध किया गया है. इस मत में परम तत्व को ‘परासंवित’ कहा गया है. जो कि सत्, चित और आनंद स्वरूप है. उसके निष्क्रिय, निश्चल व निर्गुण रूप को शिव कहा जाता है  तथा सक्रिय, चल व सगुण रूप को शक्ति. ये दोनों अभिन्न हैं. सृष्टि की इच्छा ही शिव की शक्ति है. अतः सृष्टि के निमित्त एवं उपादान कारण शिव हैं. नाथ मत में ब्रह्मांड की तमाम विविधता को मानव शरीर  में सूक्ष्म रूप से विद्यमान माना जाता है. इन दोनों की एकता को समरसीकरण कहा गया है. यह समरसीकरण ही जीव का चरम लक्ष्य है.    
चंद्र, सूर्य और अग्नि को गोरखमत में शरीर के अंदर रहने वाली सूक्ष्म शक्ति माना गया है. ‘सिद्धसिद्धांत’ पद्धति’ में नाड़ी संस्थान के ज्ञान को बहुत महत्व दिया गया है तथा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, तालु, भ्रू, निर्वाण और आकाश नाम के नौ चक्रों के साथ सोलह आधारों, तीन लक्ष्यों और पाँच आकाशों के ज्ञान को सत्य के साक्षात्कार के लिए आवश्यक बताया गया है. इससे दुखों की निवृत्ति तो होती ही है, आनंद की उपलब्धि भी होती है.
गोरखबानी
गोरखनाथ की कुछ बानियों को देखने से उनके विचारों को ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है. आइए, देखें गोरखबानी के कुछ अंश :
  1. बस्ती न सुन्यं सुन्यं न बस्ती अगम अगोचर ऐसा.
गगन सिषर मंहि बालक बोलै ताका नांव धरहुगे कैसा.
[परम तत्व तक किसी की पहुँच नहीं है. वह इन्द्रियों का विषय नहीं है. वह ऐसा है कि न हम यह कह सकते है वह कुछ है और न यह कि वह कुछ नहीं है. वह भाव और अभाव, सत और असत दोनों से परे है. शून्य यानी आकाश में ही ब्रह्म का निवास माना जाता है. वहीं आत्मा को खोजना चाहिए. जैसे बालक पाप और पुण्य से अछूता है उसी प्रकार परमात्मा भी है. ज़रा मरण से दूर काल से परे सतत बाल स्वरूप ही योगियों का साध्य है.]      
  1. वेद न कतेब न षानी बाणी, सब ढंकी तलि आणि.
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या, तहं बुझै अलष बिनाणी.
[परब्रह्म की सही व्याख्या न वेद कर पाए हैं न किताबी धर्मों की पुस्तकें. ये सब तो उसे ढकने में लगे हैं, इन्होंने सत्य को प्रकट करने के बजाय उसके ऊपर आवरण डाल दिया है. यदि ब्रहम के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान चाहिए तो ऐसा समाधि में प्रकाशित शब्द के अनुभव द्वारा ही संभव है.]
  1. हसिबा षेलिवा रहिबा रंग. कांम क्रोध न करिबा संग.
हसिबा षेलिबा गा‍इबा गीत. दिढ़ करि राषि आपंन चीत.
[हँसना चाहिए, खेलना चाहिए, मस्त रहना चाहिए लेकिन कभी काम-क्रोध का साथ न करना चाहिए. हँसना, खेलना और गीत भी गाना चाहिए किंतु अपने चित को दृढ़ करके रखना चाहिए.]
  1. हसिबा षेलिवा धरिबा ध्यान. अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियांन.
हसै षेलै न करै मन भंग. ते निहचल सदा नाथ के संग.
[हँसना, खेलना और ध्यान धरना चाहिए. रात दिन ब्रह्म ज्ञान का कथन करना चाहिए. इस प्रकार संयम पूर्वक हँसते-खेलते हुए जो अपने मन का भंग नहीं करते वे निश्चल होकर ब्रह्म के साथ रमण करते हैं.]
  1. मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा.
तिस मरणीं मरौ, जिस मरणीं गोरष मरि दीठ.
[हे जोगी मरो, मरना मीठा होता है. किंतु वह मौत मरो जिस मौत से मरकर गोरखनाथ ने परमतत्व के दर्शन किए. यह मरना सामान्य मृत्यु नहीं इसे भौतिक अस्तित्व का अंत नहीं समझना चाहिए, योग मार्ग में तो विश्वास चला आता है कि योगी कभी मरता नहीं, यहाँ मरने का अर्थ है जीवन्मुक्ति.]
  1. मनवां जोगी काया मढ़ी पंच तत्त ले कथा गढ़ी.
षिमा षडासन ग्यान अधारी सुमति पावड़ी डंड बिचारी.
[शरीर रूपी मढ़ी में मन रूपी जोगी रहता है. वह क्षमा का खडासन, ज्ञान की अधारी, सद्बुद्धि की खडाऊं, और विचार का डंडा उपयोग में लाता है. शरीर का नहीं मन का योग वास्तविक योग है. बाह्य युक्तियों को छोड़कर सही रूप से मन पर नियंत्रण लाना चाहिए.]
  1. यहू मन सकती यहू मन सिव, यहू मन पांच तत्त का जीव.
यहू मन ले जै उनमन रहै, तै तिनी लोकी की बातां कहै.
[मन शिव है. यही मन शक्ति है. यही मन पंच तत्वों से निर्मित जीव है. माया के संयोग से ही ब्रह्म मन के रूप में अभिव्यक्त होता है और मन से ही शरीर की सृष्टि होती है. इस मन को लेकर उन्मनावस्था में लीन करने से साधक सर्वज्ञ हो जाता है.]
गोरखनाथ की इन बानियों के आलोक में यदि उनके बाद के कबीर जैसे संतों की बानियों को देखें तो स्पष्ट होता है कि गोरखनाथ ने भक्तिकाल के संतों की कविता के भाव पक्ष को तो प्रभावित किया ही,  उनकी भाषा और भंगिमा पर भी दूरगामी असर छोड़ा.   

डा० ऋषभ देव शर्मा
[पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,
खैरताबाद, हैदराबाद] 

Tuesday, 17 January 2017

वरिष्ठ साहित्यकार महाश्वेता देवी को समर्पित कादम्बिनी की गोष्ठी संपन्न



कादम्बिनी क्लब हैदराबाद के तत्वावधान में रविवार दिनांक 15 जनवरी को हिंदी प्रचार सभा परिसर में क्लब की मासिक गोष्ठी का आयोजन डॉक्टर मदन देवी पोकरणा की अध्यक्षता में हुआ.



क्लब अध्यक्षा डा० अहिल्या मिश्र एवं कार्यकारी संयोजिका मीना मूथा ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि इस अवसर पर प्रथम सत्र में डा० गीता जांगिड़ (मुख्य अतिथि) और डा० अहिल्या मिश्र मंचासीन हुए.  डा० रमा द्विवेदी ने निराला रचित सरस्वती वंदना प्रस्तुत की.  डा० मिश्र ने क्लब की संक्षिप्त जानकारी देते हुए उपस्थित सभा को नववर्ष एवं मकर संक्रांति की शुभकामनाएं दी. संगोष्ठी संयोजक एवं मंत्री प्रवीण प्रणव ने वरिष्ठ साहित्यकार महाश्वेता देवी के संदर्भ में कहा कि 14 जनवरी 1926 को इस लेखिका का जन्म हुआ. क्लब अपनी पहचान विस्तृत दायरे तक पहुंचाएं इस पर विचार करते हुए प्रतिमाह विभिन्न साहित्यकारों के रचना संसार पर प्रथम सत्र में विचार रखे जाते हैं.

सुषमा पांडे ने महाश्वेतादेवी पर अपनी बात रखते हुए कहा कि नटखट, शरारती महाश्वेतादेवी ने 13 वर्ष की आयु में ही पारिवारिक जिम्मेदारी उठाते हुए अपने आसपास की जमीनी हकीकत को देखा, महसूस किया और अपने लेखन में उतारा. आदिवासी, दलित, शोषित, पीड़ित नारी, समाज में किसानों की दुर्दशा आदि को बखूबी उन्होंने अपने साहित्य में चित्रित किया. वह कई सम्मानों से पुरस्कृत हुईं.  उनका अपना निजी जीवन भी संघर्षपूर्ण रहा फिर भी बुंदेलखंड की यात्रा करते हुए दुर्गम गांव में जा-जाकर उन्होंने सच्चाई को देखा, जाना, परखा. वे विद्रोही स्वभाव की महिला थी. 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उनके दिल को छू गया. सुषमा ने उनके कई संग्रहों का जिक्र करते हुए बताया कि मूलतः बांग्ला की यह रचनाकार अन्य भाषाओं में उनके साहित्य के अनुदित होने के भी लिए जानी जाती हैं. अवधेश कुमार सिन्हा ने कहा कि करीब 250 पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं, ‘हजार चौरासी की मां’ महज 4 दिनों में यह उपन्यास उन्होंने लिख डाला. लेखन से पहले विचार मंथन, तथ्यों को इकट्ठा करना, दिमाग में खाका  बनाती और फिर उसे विस्तारित करती थी. उनके लेखन में फैन्टेसी का स्थान नहीं था. वे कहती हैं इस हवा में शब्द ही शब्द बिखरे हैं इन्हें मैं सुनती हूं. उनके लेखन की यह खूबी रही है कि पात्र और कहानीकार एक हो जाते हैं. महाश्वेता का आग्रह रहा है कि सपने देखने का पहला मौलिक अधिकार होना चाहिए. लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने इस संदर्भ में कहा कि महाश्वेता देवी की रचनाएं इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं हैं. उस कालखंड में बंगाल में अकाल मृत्यु, शोषण, गरीबी, आंदोलन आदि के कारण स्थितियां गंभीर हो रही थी. उन्होंने इतिहास पर आधारित लेखन किया. बंगाल की धरती विद्रोही रही है, यह क्रांतिकारियों की भूमि रही है. उनके लेखन में मूल परिवर्तन विवाह के बाद आया. उन्होंने वामपंथी लेखकों को पढ़ा और साथ ही सावरकर को भी पढ़ा. इस महिला साहित्यकार का साहित्य जगत में अनमोल योगदान रहा है. प्रो० रोहिताश्व ने भी महाश्वेता देवी पर अपने विचार रखे.



डॉक्टर मिश्र ने कहा कि महाश्वेता आंदोलन को जीती थी, जिया-भोगा सच लिखती थी. आंध्र प्रदेश के आंदोलनों की जानकारी परिचितों से लेती थी. प्रत्येक आदिवासी को रोटी, शिक्षा, वस्त्र मिले यह उनका सपना था और इस सपने के प्रति वह समर्पित थी. जो परिस्थितियाँ उस समय थी, आज भी वही स्थिति बनी हुई है. कहने को तो हम 21वीं शताब्दी की ओर बढ़ रहे हैं, परंतु दूर-सुदूर क्षेत्रों में त्रासद दुख, अभाव जस का तस है. महाश्वेता ने दर्शन को आम आदमी के सामने रखा. डा० गीता ने संस्था की गतिविधियों को जानकर हर्ष व्यक्त किया. डा० मदन देवी ने कहा कि उनका ‘जकड़न’ उपन्यास अवश्य पढ़ें. प्रवीण प्रणव ने प्रथम सत्र का आभार व्यक्त किया.



तत्पश्चात डॉक्टर अहिल्या मित्र को हाल ही में चेन्नई में प्राप्त सम्मान ‘लाइफटाइम अचीवमेंट’ हेतु कादम्बिनी क्लब की ओर से अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ से सम्मानित किया गया. क्लब सदस्यों ने व्यक्तिगत तौर पर भी उन्हें पुष्पगुच्छ और माला भेंट की.


दूसरे सत्र में भंवरलाल उपाध्याय के सफल संचालन में कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ. वरिष्ठ दक्खिनी रचनाकार नरेंद्र राय ‘नरेन’  एवं हास्य व्यंग हायकु सम्राट वेणुगोपाल भट्टड मंचासीन हुए. कवि गोष्ठी में सौम्या दुबे, शशि राय, भावना पुरोहित, डॉ० रमा द्विवेदी, देवी दास जी, कुंज बिहारी गुप्ता, सरिता सुराणा, दर्शन सिंह, देवा प्रसाद मायला, सुनीता लुल्ला, श्रीपूनम जोधपुरी, सुषमा पाण्डेय,  विजय बाला स्याल,  संपतदेवी मुरारका, पवित्रा अग्रवाल, डा० सीता मिश्र, ज्योति नारायण, जुगल बंग ‘जुगल’, मिलन श्रीवास्तव, नरेंद्र राय, वेणुगोपाल भट्टड, दिनेश अग्रवाल, सुरेश जैन, सुषमा वैद्य, उमा सूरज प्रसाद सोनी, डा० गीता जांगिड़, प्रवीण प्रणव, शिवकुमार तिवारी कोहिर, डा० अहिल्या मिश्र, मीना मूथा ने भाग लिया. श्रेया दुबे, सुनील गौड, मधुकर भूपेंद्र मिश्र, निर्मल प्रीत वैद्य, दयाल चंद्र अग्रवाल आदि की भी उपस्थिति रही. डा० रमा ने सदस्यों को उनके जन्म-विवाह दिन की बधाई दी. मीना मूथा ने प्रथम सत्र में संचालन सहयोग दिया. देवा प्रसाद मायला के आभार व सदस्यों द्वारा राष्ट्र गीत  के साथ गोष्ठी का समापन हुआ.




Thursday, 22 December 2016

अदम गोंडवी - आकाश को चुनौती देता ज़मीन का आदमी


धरती की सतह परपैर जमाकर समय से मुठभेड़ करने वाले जिस शख़्स ने दुष्यन्त की हिन्दी ग़ज़लों की परम्परा को एक ऐसे मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की जहाँ से एक-एक चीज ब़गैर किसी धुंधलके के पहचानी जा सके, उनका नाम रामनाथ सिंह है । मुशायरों में, घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा मटमैला कुरता और गले में सफेद गमछा डाले एक ठेठ देहाती इंसान जिसकी ओर किसी का ध्यान ही न गया हो, अचानक माइक पर आ जाए और ऐसी रचनाएं पढ़े कि आपका ध्यान और कहीं जाए ही नहीं, तो समझिए, वो इंसान कोई और नहीं, रामनाथ सिंह है । इन्हीं रामनाथ सिंह को साहित्य जगत अदम गोंडवी के नाम से जानता है । उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के आटा गाँव में 22 अक्टूबर, 1947 को एक ठाकुर किसान परिवार में जन्मे और 18 दिसम्बर, 2011 को दुनिया को अलविदा कह गये । गोंडवी जी की तीन ग़ज़ल संग्रह धरती की सतह पर (1987), गर्म रोटी की महक (2000) और समय से मुठभेड़ (2010) प्रकाशित हैं लेकिन मात्र ये तीन कृतियां ही आज हिन्दी ग़ज़लों के आकाश में उन्हें एक चमकता हुआ नक्षत्र की तरह स्थापित करने के लिए पर्याप्त है ।


          अदम जी कबीर परम्परा के कवि हैं, यानि औपचारिक शिक्षा की बड़ी-बड़ी डिग्रियां नहीं होते हुए भी वे देश, काल, मिट्टी की बातों को बिना किसी लाग-लपेट के जीवन के अपने अकृत्रिम अनुभवों से सीधे, सच्चे शब्दों में व्यक्त करने की अद्भुत योग्यता रखते हैं । अपने एहसास को पका कर उसे कविता में ढालने की विलक्षण क्षमता रखते हैं -


                             याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार

                             होती है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की

पर, कबीर और अदम में थोड़ा अंतर यह है कि जहां कबीर ने कागज-कलम नहीं पकड़ा, अदम ने कागज-कलम छुआ पर उतना ही जितना किसान ठाकुर के लिए जरूरी था ।  


          माना जाता है कि दुष्यन्त ने अपनी ग़ज़लों से शायरी की जिस राजनीति की शुरूआत की थी, अदम गोंडवी ने उसे एक नई ऊँचाई तक ले जाने की कोशिश की –


                             जो  उलझ  कर  रह  गयी  है  फाइलों के जाल में

                             गाँव  तक  वह  रोशनी  आएगी  कितने  साल में

                            

                             जिनके चेहरे पर लिखी थी जेल की ऊँची फ़सील

                             रामनामी  ओढ़कर  संसद  के   अन्दर      गये

                            

देखना,  सुनना    सच  कहना  जिन्हें भाता नहीं

                             कुर्सियों  पर  फिर  वही  बापू के बन्दर के आ गए


लेकिन अदम नई पीढ़ी से धूमिल की विरासत को बचाये रखने की गुज़ारिश करते हैं –

                             अदीबों  की  नई  पीढ़ी  से  मेरी  ये  गुज़ारिश    है

                             सँजो कर रक्खें धूमिल की विरासत को क़रीने से


          गोंडवी शहरी शायर के शालीन और सुसंस्कृत लहजे में बोलने के बजाय, महानगरीय चकाचौंध और चमकीली कविताई से हटकर ठेठ गंवई अंदाज में दो टूकपन और बेतकल्लुफ़ी से काम लाते हैं । उनके कथन में प्रत्यक्षता, आक्रामकता और तड़प से भरी हुई व्यंग्मयता है । वस्तुतः उनकी ग़ज़लें अपने ज़माने के लोगों से ठोस धरती की सतह पर लौट आने का आग्रह करती हैं –

                             ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नजारों में

                             मुसल्सल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में



                            

अदीबों  ठोस  धरती  की सतह पर लौट भी आओ

                             मुलम्मे  के  सिवा  क्या  है  फ़लक  के चाँद तारों में



इसी क्रम में आजकल के बूर्जुआ एवं तथाकथित बुद्धिजीवी साहित्कारों पर तंज कसते हुए अदम कहते हैं –

                             गंगाजल  अब  बूर्जुआ तहज़ीब की पहचान है

                             तिश्नगी को वोदका के आचमन तक ले चलो



                             प्रेमचन्द की रचनाओं को एक सिरे से ख़ारिज करके

                             ये ओशो के अनुयायी हैं, कामसूत्र पर भाष लिखेंगे



                             एक अलग ही छवि बनती है परम्परा भंजक होने से

                             तुलसी इनके लिए विधर्मी, देरिदा को खास लिखेंगे


ऐसे साहित्यकारों से इतर गोंडवी मानवता का, अपने कालखंड का एक नया इतिहास लिखने की बात करते हैं –

                             मानवता  का  दर्द  लिखेंगे, माटी  की  बू-बास लिखेंगे

                             हम अपने इस कालखंड का एक नया इतिहास लिखेंगे

                            

                             सदियों  से  जो  रहे  उपेक्षित श्रीमन्तों के हरम सजाकर

                             उन  दलितों  की  करूण  कहानी मुद्रा से रैदास लिखेंगे


          दरअसल, अदम की शायरी में अवाम बसता है, उसके सुख दुःख बसते हैं, शोषित और शोषण करने वाले बसते हैं । उनकी शायरी न तो हमें वाह करने का अवसर देती है और न आह भरने की मजबूरी परोसती है । सीधे, सच्चे दिल से कही उनकी शायरी सीधे सादे लोगों के दिलों में बस जाती है –

                             बेचता  यूँ  ही  नहीं  है  आदमी  इंसान  को

                             भूख  ले  जाती  है  ऐसे  मोड़  पर इंसान को



                             सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए

                             गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख़ान को



                             शबनमी  होठों  की  गर्मी  दे न पाएगी सुकून

                             पेट  के  भूगोल  में  उलझे  हुए  इंसान    को


          गोंडवी जी की शायरी में आम जनता की गुर्राहट और आक्रामक मुद्रा का सौंदर्य, धार लगा व्यंग्य मिसरे-मिसरे में मौजूद है -

                             काजू  भुने  प्लेट  में  व्हिस्की गिलास में

                             उतरा  है  रामराज  विधायक  निवास  में



                             पक्के  समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत

                             इतना असर है खादी के उजले लिवास में



नेताओं द्वारा जनता के शोषण, व्यवस्था की विसंगतियों की इंतहा को ख़त्म करने का एकमात्र विकल्प बताते हुए गोंडवी कहते हैं –

                             जनता के पास एक ही चारा है बग़ावत

                             यह बात कह रहा हूँ मैं होशो हवास में


          अदम अपनी सांस्कृतिक विरासत को स्वर्णिम मानने से इन्कार करते हैं क्योंकि इसमें निम्न जातियों, वंचितों के शोषण का इतिहास मिलता है –

                   आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत

                   वो  कहानी  है  महज़  प्रतिरोध  की, संत्रास की

                            

वेद  में  जिनका  हवाला  हाशिये  पर  भी  नहीं

                             वे  अभागे  आस्था  विश्वास  लेकर  क्या   करें



                             लोकरंजन  हो  जहां  शम्बूक-वध  की  आड़ में

                             उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें



                             कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास

                             त्रासदी,  कुंठा,  घुटन,  संत्रास  लेकर  क्या   करें


          सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्षधर यह मानते हैं कि भारत हिन्दुओं का देश है और मुस्लिम समुदाय के लोग बाहर से आकर यहाँ बस गये । लेकिन अदम का मानना है कि बहुसंख्यक हिन्दू भी पूरी तरह से इसी धरती के नहीं हैं वरन् सदियों पूर्व बाहर से आये विदेशी आक्रन्ताओं की मिली-जुली कौम है -

                             हममें  कोई  हूण,  कोई  शक,  कोई मंगोल है

                             दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये


इसलिए गोंडवी दोनों कौमों के बीच नफरत फैलाने वाले नेताओं को कहते हैं –

                             हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये

                             अपनी कुरसी के लिए जज़्बात को मत   छेड़िये



                             ग़र गलतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले

                             ऐसे  नाजुक  वक्त  में  हालात  को  मत  छेड़िये

अदम चाहते हैं –

                             छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़

                             दोस्त,  मेरे  मज़हबी  नग्मात  को  मत    छेड़िये


          ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े सीधे सच्चे अदम गोंडवी महानगरीय तथाकथित बुद्धिजीवियों के खोखलेपन से अलग एक नये अंदाज़ में अपने अकलुष दिल की गहराइयों से बेलौस दोटूक शब्दों में सदियों से शोषितों, उपेक्षितों के प्रति हो रहे अन्याय के ख़िलाफ लगातार आवाज़ उठाते रहे, नेताओं के दोहरे चरित्र को बेनक़ाब करते रहे, भूखे, मुफ़लिसों की रहनुमाई करते हुए उनके एहसासों को अपनी ग़ज़लों में महसूस करते रहे –


                             भूख  के  एहसास  को  शेरो-सुख़न  तक ले चलो

                             या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

और अंत में कहते गये -

                            

अवधेश कुमार सिन्हा

हैदराबाद