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Tuesday, 11 April 2017

ऐसे मन लै जोगी खेलै : गुरु गोरखनाथ

परंपरा कनफटे जोगियों की

पुरानी रोमांटिक प्रणय-गाथाओं से लेकर आधुनिक सनसनीखेज मीडिया-कथाओं तक में एक रोचक रूढि की तरह ध्यान खींचने वाले ‘कनफटे जोगी’ असल में नाथ-पंथ के अनुयायी हठयोगी होते हैं. नाथ-पंथ और  ‘हठयोग’ का प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ को माना जाता है जो हिंदी के आदिकाल के सर्वाधिक प्रखर कवियों में अग्रणी हैं. गुरु गोरखनाथ के जन्म और मृत्यु की निश्चित तिथियाँ ज्ञात नहीं हैं, लेकिन अलग-अलग इतिहासकारों के हवाले से इतना तो निश्चित रूप से समझा जा सकता है कि वे नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच किसी समय विद्यमान थे. प्राच्य विद्या ग्रंथ संग्रहालय, चेन्नई में उपलब्ध ग्रंथ ‘चोलनपूर्व पट्टयम’ तथा कोयम्बत्तूर में प्राप्त शिलालेखों से पता चला है कि कोयंबत्तूर से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित उडुमलैपेट्टै नामक नगर (जिसका पुराना नाम चंद्रगिरि है) गोरखनाथ का जन्मस्थल है.

क्या है हठयोग?
गुरु गोरखनाथ ने ‘सहज योग’ के विकारों को पहचान कर अपने ‘हठयोग’ की स्थापना की. इस मार्ग को ‘हठयोग’ के अलावा नाथ-संप्रदाय, नाथ-पंथ, सिद्ध-मत, सिद्ध-धर्म, योग-मार्ग, योग-संप्रदाय, अवधूत-मत और अवधूत-संप्रदाय जैसे नामों से भी जाना जाता है. दरअसल सहज योग में पंच मकार (मांस, मत्स्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन) की स्वीकृति के कारण विकृति आ गई थी. गुरु गोरखनाथ ने इस लोक-विरुद्ध स्थिति को पहचाना और विशेष रूप से नारी-भोग को साधना का अंग बनाने का दृढ़ता से खंडन किया और हठयोग के रूप में ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा की. यहाँ यह भी जान लें कि गोरखनाथ का योगमार्ग महर्षि पतंजलि के योगमार्ग से भिन्न है क्योंकि पतंजलि के ग्रंथ ‘योगसूत्र’ में नाड़ीशोधन, योगमुद्रा, कुंडलिनी शक्ति का जागरण और शिवशक्ति की समरसता आदि का उल्लेख नहीं मिलता, जिनका हठयोग में सबसे अधिक महत्त्व है.
गोरखनाथ और उनका पंथ
नाथ संप्रदाय के हिंदी कवियों के रूप में यों तो गोरखनाथ, चौरंगीनाथ, गोपीचंद, चुणकरनाथ, भरथरी और जालंध्रीपाव का उल्लेख किया जाता है लेकिन वस्तु और अभिव्यक्ति की मौलिकता की दृष्टि से इनमें गोरखनाथ ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. गुरु गोरखनाथ या गोरक्षनाथ को मध्यकालीन भारतीय पुनर्जागरण के संदर्भ में उन्हें शंकराचार्य के बाद दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है. उनके द्वारा चलाए गए पंथ को ‘गोरखपंथ’ कहा जाता है. हमारी मान्यता तो यह है कि विकृति पर सीधे-सीधे अक्खड़ शब्दों में चोट करने की बहुचर्चित प्रवृत्ति कबीरदास ने गुरु गोरखनाथ से ही विरासत में पाई है. उल्लेखनीय है कि ‘ज्ञानवेट्टीयान’ नामक तमिल ग्रंथ में भी गोरखनाथ को मध्यकालीन भारत का अद्वितीय रहस्यवादी सिद्ध, धर्मगुरु और राष्ट्रनायक बताया गया है. ‘गोरखनाथ’ या ‘गोरक्षनाथ’ उनका  दीक्षानाम है. उनका दीक्षापूर्व नाम ‘पशुपति’ माना जाता है.
गुरु गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 40 बताई जाती है जिनमें से ‘गोरखबानी’ के संपादक डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने 14 को ही प्रामाणिक माना है. ये हैं – (1) सबदी, (2) पद, (3) प्राणसंकली, (4) सिस्यादरसन, (5) नरवैबोध, (6) अभैमात्रा जोग, (7) आतम-बोध, (8) पंद्रह तिथि, (9) सप्तवार, (10) मछींद्र गोरख बोध, (11) रोमावली, (12) ज्ञानतिलक, (13) ज्ञान चौंतीसा, (14) पंचमात्रा.
गोरखनाथ ने अपने समय में प्रचलित कई सारे संप्रदायों का विलय करके नाथपंथ या गोरखपंथ चलाया, इसलिए उनकी बानियों  में उन संप्रदायों के विचारों की छाया भी दिखाई देती है. उनके समय में शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन और वैष्णव योगमार्ग प्रचलित थे. इन सबको अपने युग के संदर्भ में  नई दिशा देते हुए और वर्णव्यवस्था तथा जातिभेद का खंडन करते हुए गोरखनाथ ने अपनी बानियों में गुरु महिमा, इंद्रिय संयम, प्राण साधना, वैराग्य, मनःसाधना, कुंडलिनी जागरण और शून्य समाधि की विशद चर्चा की. इन सबमें उन्होंने नीति और साधना पर बल दिया तथा हठयोग की प्रतिष्ठा की : नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा./ ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा.अभिप्राय यह है कि वैष्णव महाप्रसाद और सहजयानी पंचमकार दोनों ही जिसे विचलित न कर सकें, ऐसे मन वाला योगी ही अपने भीतर बसे आनंद के भंडार में विहार करता है.
कहने की ज़रूरत नहीं की गोरखपंथी हठयोग में सांसारिक आकर्षण को हठपूर्वक रोकने के लिए शक्तिरूपा कुंडलिनी को जगाकर शिव के निवास सहस्रार चक्र में ले जाने की साधना की जाती है. कुंडलिनी साधना के नाम पर स्त्री-पुरुष-समागम के बहाने व्यभिचार को बढ़ावा देने वालों की गुरु गोरखनाथ ने कठोर शब्दों में निंदा की  तथा ‘हठ’ साधना को  ह अर्थात सूर्य और ठ अर्थात चंद्रमा की नाड़ियों के संयोग की साधना के रूप में प्रचारित किया. इस साधना का आधार ब्रह्मचर्य है जो भोग द्वारा समाधि के वाममार्ग का विरोधी है.
योगमार्ग की प्राचीनता
वास्तव में, एक साधना पद्धति के रूप में योग मार्ग बहुत पुराना है और एक प्रकार से गुरु गोरखनाथ ने उसका जीर्णोद्धार किया. योग की प्राचीनता के सबसे पुराने प्रमाण सिंधुघाटी सभ्यता के काल में प्राप्त होते हैं. यह सभ्यता आर्य और द्रविड कही जाने वाली दोनों ही सभ्यताओं की विशिष्टताओं से युक्त है. यदि द्रविड-आर्य-संघर्ष की पश्चिमी इतिहासकारों की कपोल कल्पना के स्थान पर आर्य-द्रविड-समन्वय की खोज करनी हो तो यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है कि वर्तमान सामासिक हिंदू धर्म के बहुत से तत्व सिंधु घाटी सभ्यता की देन हैं. सिंधु सभ्यता की मूर्तियों का विवेचन करते हुए डॉ. नंजुंडन ने यह प्रतिपादित किया है कि उस समय योग की प्रतिष्ठा थी तथा योगमुद्रा धारण किए हुए योगियों की मूर्तियों का प्रचलन था. ऐसी योग मुद्राओं में मूर्तियों की प्राप्ति सिद्ध करती है कि उस अतीत काल में शिव-पशुपति योगियों के आराध्य माने जाते थे और उनके उपासक योगी जन समाज में थे.  इस दृष्टि से योग-विज्ञान को सिंधु सभ्यता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन कहा जाना चाहिए. योग विज्ञान की यह धारा वेदों में भी उपलब्ध है. ऋग्वेद में वर्णित केशिन मुनि में योगी के लक्षण हैं. कुछ मंत्रद्रष्टा ऋषि अवश्य ही योग के रहस्यों से परिचित रहे होंगे. अथर्ववेद में तो पूर्ण विकसित योग प्रणाली का स्वरूप प्राप्त होता है जिसमें प्राण और अपान वायु को वश में करने के लिए प्राणायाम की महत्ता स्वीकार की गई है. विश्व के धारक और रक्षक के रूप में प्राण को आरण्यकों में सर्वत्र व्याप्त तथा आयु का कारण माना गया है. उपनिषदों में भी योगमार्ग का निरूपण मिलता  है. कठोपनिषद और तैत्तिरियोपनिषद में सर्वप्रथम ‘योग’ शब्द का पारिभाषिक अर्थ में प्रयोग हुआ है और यह अर्थ है चित्त को विषयों से हटाकर आत्मा में लीन कर देना. श्वेताश्वतरोपनिषद की प्रतिष्ठा शैव योग के प्रतिपादक प्राचीनतम उपनिषद के रूप में है. इस उपनिषद में ध्यानयोग की विधि और उसके महत्व का उद्घाटन किया गया है तथा आसन, प्राणायाम आदि योग के अन्य अंगों की भी महत्ता स्पष्ट की गई है. मैत्रेय उपनिषद में खेचरी मुद्रा का भी परिचय उपलब्ध है, जबकि इसी के समकालीन अर्थात ईसा के दो शताब्दी इधर या उधर रचित चूलिकोपनिषद में सेश्वरयोग का विवेचन है. आठवीं शताब्दी के पूर्व रचित ‘योगोपनिषद’ में प्रतिपादित विषय का गोरखनाथ रचित ‘सिद्ध सिद्धांत पद्धति’ से आश्चर्यजनक साम्य है. ‘ध्यान बिंदु’ और ‘नाद बिंदु’ उपनिषदों तथा ‘मंडल ब्राह्मण’ के अनेक श्लोकों का भी गोरखनाथ की रचनाओं पर काफी असर दिखाई देता है. गोरखनाथ की योग प्रणाली इस परंपरा का ही समय के अनुकूल परिवर्तित और परिवर्द्धित रूप मात्र है.
गोरखपंथ की मौलिकता
यहाँ यह बताना जरूरी है कि योग की परंपरा का विस्तार होने के बावजूद गोरख-दर्शन अनुकरण या नक़ल नहीं है. बल्कि गोरखनाथ जिस निर्णय पर पहुँचे वह पूर्णतः उनकी स्वानुभूति पर आधारित है; अतः सर्वथा मौलिक है. गोरख-दर्शन में परमसत्ता को अनेक अवस्थाओं से युक्त अंड-पिंड के रूप में सर्वत्र विद्यमान माना गया है तथा अद्वयवाद को इस योग मार्ग का मूल तत्व सिद्ध किया गया है. इस मत में परम तत्व को ‘परासंवित’ कहा गया है. जो कि सत्, चित और आनंद स्वरूप है. उसके निष्क्रिय, निश्चल व निर्गुण रूप को शिव कहा जाता है  तथा सक्रिय, चल व सगुण रूप को शक्ति. ये दोनों अभिन्न हैं. सृष्टि की इच्छा ही शिव की शक्ति है. अतः सृष्टि के निमित्त एवं उपादान कारण शिव हैं. नाथ मत में ब्रह्मांड की तमाम विविधता को मानव शरीर  में सूक्ष्म रूप से विद्यमान माना जाता है. इन दोनों की एकता को समरसीकरण कहा गया है. यह समरसीकरण ही जीव का चरम लक्ष्य है.    
चंद्र, सूर्य और अग्नि को गोरखमत में शरीर के अंदर रहने वाली सूक्ष्म शक्ति माना गया है. ‘सिद्धसिद्धांत’ पद्धति’ में नाड़ी संस्थान के ज्ञान को बहुत महत्व दिया गया है तथा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, तालु, भ्रू, निर्वाण और आकाश नाम के नौ चक्रों के साथ सोलह आधारों, तीन लक्ष्यों और पाँच आकाशों के ज्ञान को सत्य के साक्षात्कार के लिए आवश्यक बताया गया है. इससे दुखों की निवृत्ति तो होती ही है, आनंद की उपलब्धि भी होती है.
गोरखबानी
गोरखनाथ की कुछ बानियों को देखने से उनके विचारों को ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है. आइए, देखें गोरखबानी के कुछ अंश :
  1. बस्ती न सुन्यं सुन्यं न बस्ती अगम अगोचर ऐसा.
गगन सिषर मंहि बालक बोलै ताका नांव धरहुगे कैसा.
[परम तत्व तक किसी की पहुँच नहीं है. वह इन्द्रियों का विषय नहीं है. वह ऐसा है कि न हम यह कह सकते है वह कुछ है और न यह कि वह कुछ नहीं है. वह भाव और अभाव, सत और असत दोनों से परे है. शून्य यानी आकाश में ही ब्रह्म का निवास माना जाता है. वहीं आत्मा को खोजना चाहिए. जैसे बालक पाप और पुण्य से अछूता है उसी प्रकार परमात्मा भी है. ज़रा मरण से दूर काल से परे सतत बाल स्वरूप ही योगियों का साध्य है.]      
  1. वेद न कतेब न षानी बाणी, सब ढंकी तलि आणि.
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या, तहं बुझै अलष बिनाणी.
[परब्रह्म की सही व्याख्या न वेद कर पाए हैं न किताबी धर्मों की पुस्तकें. ये सब तो उसे ढकने में लगे हैं, इन्होंने सत्य को प्रकट करने के बजाय उसके ऊपर आवरण डाल दिया है. यदि ब्रहम के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान चाहिए तो ऐसा समाधि में प्रकाशित शब्द के अनुभव द्वारा ही संभव है.]
  1. हसिबा षेलिवा रहिबा रंग. कांम क्रोध न करिबा संग.
हसिबा षेलिबा गा‍इबा गीत. दिढ़ करि राषि आपंन चीत.
[हँसना चाहिए, खेलना चाहिए, मस्त रहना चाहिए लेकिन कभी काम-क्रोध का साथ न करना चाहिए. हँसना, खेलना और गीत भी गाना चाहिए किंतु अपने चित को दृढ़ करके रखना चाहिए.]
  1. हसिबा षेलिवा धरिबा ध्यान. अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियांन.
हसै षेलै न करै मन भंग. ते निहचल सदा नाथ के संग.
[हँसना, खेलना और ध्यान धरना चाहिए. रात दिन ब्रह्म ज्ञान का कथन करना चाहिए. इस प्रकार संयम पूर्वक हँसते-खेलते हुए जो अपने मन का भंग नहीं करते वे निश्चल होकर ब्रह्म के साथ रमण करते हैं.]
  1. मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा.
तिस मरणीं मरौ, जिस मरणीं गोरष मरि दीठ.
[हे जोगी मरो, मरना मीठा होता है. किंतु वह मौत मरो जिस मौत से मरकर गोरखनाथ ने परमतत्व के दर्शन किए. यह मरना सामान्य मृत्यु नहीं इसे भौतिक अस्तित्व का अंत नहीं समझना चाहिए, योग मार्ग में तो विश्वास चला आता है कि योगी कभी मरता नहीं, यहाँ मरने का अर्थ है जीवन्मुक्ति.]
  1. मनवां जोगी काया मढ़ी पंच तत्त ले कथा गढ़ी.
षिमा षडासन ग्यान अधारी सुमति पावड़ी डंड बिचारी.
[शरीर रूपी मढ़ी में मन रूपी जोगी रहता है. वह क्षमा का खडासन, ज्ञान की अधारी, सद्बुद्धि की खडाऊं, और विचार का डंडा उपयोग में लाता है. शरीर का नहीं मन का योग वास्तविक योग है. बाह्य युक्तियों को छोड़कर सही रूप से मन पर नियंत्रण लाना चाहिए.]
  1. यहू मन सकती यहू मन सिव, यहू मन पांच तत्त का जीव.
यहू मन ले जै उनमन रहै, तै तिनी लोकी की बातां कहै.
[मन शिव है. यही मन शक्ति है. यही मन पंच तत्वों से निर्मित जीव है. माया के संयोग से ही ब्रह्म मन के रूप में अभिव्यक्त होता है और मन से ही शरीर की सृष्टि होती है. इस मन को लेकर उन्मनावस्था में लीन करने से साधक सर्वज्ञ हो जाता है.]
गोरखनाथ की इन बानियों के आलोक में यदि उनके बाद के कबीर जैसे संतों की बानियों को देखें तो स्पष्ट होता है कि गोरखनाथ ने भक्तिकाल के संतों की कविता के भाव पक्ष को तो प्रभावित किया ही,  उनकी भाषा और भंगिमा पर भी दूरगामी असर छोड़ा.   

डा० ऋषभ देव शर्मा
[पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,
खैरताबाद, हैदराबाद] 

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