कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद

दक्षिण भारत के हिन्दीतर क्षेत्र में विगत २ दशक से हिन्दी साहित्य के संरक्षण व संवर्धन में जुटी संस्था. विगत २२ वर्षों से निरन्तर मासिक गोष्ठियों का आयोजन. ३०० से अधिक मासिक गोष्ठियाँ संपन्न एवं क्रम निरन्तर जारी...
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Monday, 4 December 2017

किस को आती है मसिहाई किसे आवाज़ दूँ


जोश मलीहाबादी जिनका जन्म नाम शब्बीर हसन खां था, का जन्म 5  दिसम्बर 1898 को मलीहाबाद में जो कि उत्तर प्रदेश में लखनऊ ज़िले की एक पंचायत है, में हुआ था. ये ग़ज़ल और नज़्मे तखल्लुस 'जोश' नाम से लिखते थे और अपने जन्म स्थान का नाम भी आपने अपने तखल्लुस में जोड़ दिया और इस तरह इनका नाम जोश मलीहाबादी हो गया ।

जोश मलीहाबादी सेंट पीटर्स कॉलेज आगरा में पढ़े और वरिष्ठ कैम्ब्रिज परीक्षा 1914 में उत्तीर्ण की। और साथ ही साथ अरबी और फ़ारसी का अध्ययन भी करते रहे। 6 माह रविंद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में भी रहे। परन्तु 1916 में पिता बशीर अहमद खान की मृत्यु होने के कारण कॉलेज की आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सके।

जोश और हैदराबाद से जुड़ा एक मज़ेदार वाकया ये है कि 1925 में जोश ने 'उस्मानिया विश्वविद्यालय' हैदराबाद रियासत में अनुवाद की निगरानी का कार्य शुरू किया। परन्तु उनका यह प्रवास हैदराबाद में ज्यादा दिन न रह सका। अपनी एक नज़्म जो कि रियासत के शासक के ख़िलाफ़ थी जिस कारण से इन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया गया। इसके तुरंत बाद जोश ने पत्रिका, कलीम (उर्दू में "वार्ताकार") की स्थापना की, जिसमें उन्होंने खुले तौर पर भारत में ब्रिटिश शासन से आज़ादी के पक्ष में लेख लिखा था, जिससे उनकी ख्याति चहुं ओर फैल गयी और उन्हें शायर-ए-इन्कलाब कहा जाने लगा और इस कारण से इनके रिश्ते कांग्रेस विशेषकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मजबूत हुए। भारत में ब्रिटिश शासन के समाप्त होने के बाद जोश आज-कल प्रकाशन के संपादक बन गए।

जोश उर्दू साहित्य में उर्दू पर अधिपत्य और उर्दू व्याकरण के सर्वोत्तम उपयोग के लिए जाने जाते हैं। इनका पहला शायरी संग्रह सन 1921 में प्रकाशित हुआ जिसमें शोला-ओ-शबनम, जुनून-ओ-हिकमत, फ़िक्र-ओ-निशात, सुंबल-ओ-सलासल, हर्फ़-ओ-हिकायत, सरोद-ओ-खरोश और इरफ़ानियत-ए-जोश शामिल है। फ़िल्म निर्देशक डब्ल्यू. ज़ी. अहमद की राय पर इन्होंने शालीमार पिक्चर्स के लिए गीत भी लिखे।

उर्दू लिखने और बोलने के तरीके को लेकर वो बड़े पाबंद थे, उर्दू शब्दों का ग़लत उच्चारण करने पर उन्होंने बड़े-बड़ों को नहीं बख़्शा । जोश के पोते फ़र्रुख़ जमाल लिखते हैं कि एक बार पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खाँ ने उन्हें ख़ुश करने के लिए कहा कि आप बहुत बड़े आलम हैं. जोश ने फ़ौरन जवाब दिया सही लफ़्ज़ आलिम है न कि आलम. इस पर अयूब नाराज़ हो गए और उन्होंने आदेश दिया कि जोश को दी गई सीमेंट एजेंसी उनसे वापस ले ली जाए और ऐसा ही हुआ.

भाषा को लेकर उनकी सनक इस हद तक थी कि एक बार उन्होंने सरेआम साहिर लुधियानवी को उनकी मशहूर नज़्म 'ताजमहल' में एक शब्द ग़लत उच्चारित करने के लिए टोका था.

जवाहरलाल नेहरू को जब उन्होंने अपनी एक किताब दी तो उन्होंने कहा,"मैं आपका मशकूर हूँ." जोश ने उन्हें फ़ौरन टोका, "आपको कहना चाहिए था शाकिर हूँ."

जोश फ़िराक़ गोरखपुरी से एक साल छोटे थे, लेकिन तब भी फ़िराक उन्हें अपना गुरु मानते थे. फ़िराक़ ने एक बार एक टेलिविजन इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि उन्हें अपनी ग़ज़ल पूरी करने के लिए एक शब्द नहीं मिल रहा था. वो बहुत झिझकते हुए जोश के पास गए थे. जोश के मुंह से वो शब्द एक रत्न की तरह बाहर आया था.

1956 में जोश बिना किसी को बताए पाकिस्तान चले गए. जाने से पहले वो नेहरू से सलाह मांगने गए. नेहरू ने कहा कि ये आपका निजी मामला है, लेकिन आप फिर भी मौलाना आज़ाद से सलाह ले लीजिए. उनका सोचना था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है जहाँ हिंदी भाषा को ज्यादा तवज्जो दी जायगी न की उर्दू को, जिससे उर्दू का भारत में कोई भविष्य नहीं है। पकिस्तान जाने के बाद ये कराची में बस गए और आपने मौलवी अब्दुल हक के साथ में "अंजुमन-ए-तरक़्क़ी-ए-उर्दू" के लिए काम किया।

मौलाना ने कहा कि यूँ तो देशप्रेम की कोई क़ीमत नहीं होती, लेकिन अगर होती भी है तो भी आपको उसकी क़ीमत से कहीं ज़्यादा मिल चुका है. बहरहाल जोश माने नहीं और पाकिस्तान चले गए. वो कहते हैं, "दरअसल जोश पर उनके बेटों का बहुत दबाव था. नेहरू ने उन्हें सलाह दी थी कि वो अपने बेटों को पाकिस्तान भेज दें और ख़ुद यहीं रहें, लेकिन उनकी पत्नी ने कहा कि वो अपने बेटों और पोतों के बिना यहाँ नहीं रह पाएंगी."

देहलवी के अनुसार, "फिर पाकिस्तान के लोगों ने भी उन्हें सब्ज़बाग दिखाए कि उनके पाकिस्तान पहुंचते ही उन्हें एक हवेली दे दी जाएगी. मौलाना आज़ाद इससे इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने कहा मेरे ज़िंदा रहते तुम भारत में क़दम नहीं रखना और ऐसा ही हुआ. मौलाना आज़ाद की मौत के बाद ही जोश पहली बार भारत वापस आए."

भारत से पाकिस्तान जा बसने के बाद जोश मलीहाबादी तीन बार भारत आए थे. एक बार मौलाना आज़ाद की मौत पर, दूसरी बार जवाहरलाल नेहरू के मरने पर और तीसरी बार 1967 में.

जोश बहुत ही हाज़िर जबाब भी थे. एक बार जोश मलीहाबादी पाकिस्तान में मशहूर आर्टिस्ट ज़िया मोहिउद्दीन और कराची के जल विभाग के प्रमुख के साथ एक टीवी शो कर रहे थे. ज़िया ने उनसे सवाल किया, "जोश साहब, आपके इलाक़े में पानी की तो कोई समस्या नहीं है?

जोश बोले, "भाई पानी तो कभी-कभी आता है, लेकिन बिल बाक़ाएदगी से हर माह की पहली को आ जाता है. उस्मान साहब (बिजली विभाग के प्रमुख) का बस चले तो करबला में इमाम हुसैन को भी पानी का बिल दे देते."

दिल्ली के मशहूर यूनाइटेड कॉफ़ी हाउस के मालिक प्रेम मोहन कालरा एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं. एक बार उनके दोस्तों ने उन्हें यूनाइटेड कॉफ़ी हाउस कॉफ़ी पीने के लिए बुलाया. कॉफ़ी और सैंडविच खाने के बाद जोश शौचालय चले गए. जब वो वापस आए तो उनके सारे दोस्त नदारत हो चुके थे. बैरे ने बिल जोश के सामने पेश किया. जोश के पास बिल देने लायक पैसे नहीं थे. मैनेजर ने कहा कि इसके एवज़ में आपको अपनी शेरवानी गिरवी रखनी पड़ेगी. जोश ने बहुत कहा, लेकिन मैनेजर नहीं माना. जोश को अपनी शेरवानी उतारनी पड़ी. इत्तेफ़ाक से उस दिन उन्होंने शेरवानी के नीचे कुछ नहीं पहना था. वो सिर्फ़ बनियान और पायजामा पहने कॉफ़ी हाउस से बाहर निकल रहे थे कि उसके मालिक किशनलाल कालरा अंदर घुस रहे थे. उन्होंने जोश को पहचाना और पूछा हुज़ूर आप यहाँ कैसे? उन्होंने किशनलाल को पूरी कहानी सुनाई. उन्होंने उनकी शेरवानी वापस दिलवाई और मैनेजर को बहुत डांटा.वो उन्हें अपने घर ले गए और उनसे कहा कि वो जब तक चाहें वहाँ रह सकते हैं.

हर दिसंबर को किशनलाल एक मुशायरे का आयोजन करते थे. उसमें जोश के अलावा फ़िराक़, साहिर लुधियानवी, महेंदर सिंह बेदी और कैफ़ी आज़मी जैसे शायर आते थे. पंडित नेहरू उस मुशायरे में ज़रूर आते थे. मुशायरे के बाद चुनिंदा स्कॉच, शामी क़बाब और लज़ीज़ खाना खिलाया जाता था.

जगजीत सिंह ने जोश मलीहाबादी के कई ग़ज़ल और नज़्मों को अपनी आवाज़ दी. 1954 में उन्हें भारत सरकार की तरफ से पद्म भूषण दिया गया. 22 फरवरी 1982 को पाकिस्तान में उनका देहांत हो गया.



दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैं ने तुझे याद किया

इस का रोना नहीं क्यूँ तुम ने किया दिल बर्बाद
इस का ग़म है कि बहुत देर में बर्बाद किया

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किस को आती है मसिहाई किसे आवाज़ दूँ
बोल ऐ ख़ूं ख़ार तनहाई किसे आवाज़ दूँ

चुप रहूँ तो हर नफ़स डसता है नागन की तरह
आह भरने में है रुसवाई किसे आवाज़ दूँ

उफ़्फ़ ख़ामोशी की ये आहें दिल को बरमाती हुई
उफ़्फ़ ये सन्नाटे की शेहनाई किसे आवाज़ दूँ


- प्रवीण प्रणव

Friday, 23 September 2016

पत्रों के आईने में दिनकर - प्रवीण प्रणव

23 सितंबर 1908 को बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया गाँव में जन्मे रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उस दौर के कवि हैं जब हिन्दी काव्य जगत् से छायावाद का युग समाप्त हो रहा था। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं।
पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये। १९३४ से १९४७ तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। १९५० से १९५२ तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने।

स्वतंत्रता से पहले  दिनकर सरकारी मुलाज़िम थे. पर उनकी रचनाओं में राष्ट्र भक्ति कूट कूट कर भरी थी. उन दिनों रेणुका और हुंकार की कुछ रचनाऐं यहाँ-वहाँ प्रकाश में आईं और अग्रेज़ प्रशासकों को समझते देर न लगी कि वे एक ग़लत आदमी को अपने तंत्र का अंग बना बैठे हैं और दिनकर की फ़ाइल तैयार होने लगी, बात-बात पर क़ैफ़ियत तलब होती और चेतावनियाँ मिला करतीं। चार वर्ष में बाईस बार उनका तबादला किया गया।
उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। उनकी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी  के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार  प्रदान किया गया।

द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित उनके प्रबन्ध काव्य कुरुक्षेत्र को विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ काव्यों में ७४वाँ स्थान दिया गया।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि दिनकरजी गैर-हिंदीभाषियों के बीच हिन्दी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे और अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे।

हरिवंश राय बच्चन ने कहा कि दिनकरजी को एक नहीं, बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिन्दी-सेवा के लिये अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिये।

रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा कि दिनकरजी ने देश में क्रान्तिकारी आन्दोलन को स्वर दिया।

नामवर सिंह ने कहा कि दिनकरजी अपने युग के सचमुच सूर्य थे।

प्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव ने कहा कि दिनकरजी की रचनाओं ने उन्हें बहुत प्रेरित किया।

‘मिट्टी की ओर’, ‘अर्ध्दनारीश्वर’, ‘रेती के फूल’, ‘वेणुवन’, ‘साहित्यमुखी’, ‘काव्य की भूमिका’, ‘प्रसाद, पंत और मैथिलीशरण गुप्त’ तथा ‘संस्कृति के चार अध्याय’ आपके गद्य ग्रंथ हैं।

‘रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘रसवंती’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘रश्मिरथी’, ‘परशुराम की प्रतिज्ञा’, ‘हारे को हरिनाम’ और ‘उर्वशी’ दिनकर जी के काव्य संकलन हैं।


4 अप्रेल सन् 1974 को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ये नश्वर देह छोड़कर चले गए।अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे।

पत्रों के आईने में दिनकर

पुस्तक या लेख ये सोच कर ही लिखे जाते हैं कि ये लोगों तक पहुंचेंगे और लोग उस पर अपनी प्रतिक्रियाएं देंगे. अतः लेखक इन्हें लिखते समय सावधान रहता है. कोशिश होती है कि अपने मन के भाव खासकर वैसे भाव, जो जनप्रिय न हों, न लिखे जाएँ. डायरी में भी संतुलित बातें ही लिखी जाती हैं क्यूंकि कहीं न कहीं जेहन में ये बात रहती है कि कोई इन्हें पढ़ेगा और फिर क्या सोचेगा. पत्रों के बारे में ऐसी कोई समस्या नहीं है. पत्रों की अमूनन कोई प्रति बना कर नहीं रखी जाती, अगर सरकारी पत्राचार न हों तो. तो दिनकर को परखने के लिए उनके पत्रों से बेहतर विकल्प और क्या होगा.
दिनकरजी के द्वारा लिखे गए पत्रों तो कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है. पत्र जहां उन्होंने अपने परिवार और व्यक्तिगत जीवन की बात की, या पत्र जो उन्होंने अपने मित्रों तो लिखे, या पत्र जिसमे उनके यात्रा विवरण हैं पर यहाँ हम उन कुछ चुनिन्दा पत्रों की बात करेंगे जो उन्होंने साहित्य से सम्बंधित बातों पर लिखा.

डा० शिवमंगल सिंह सुमन को लिखा गया पत्र – 27-10-53
हिंदी कविता की प्रगति अवरुद्ध है. हर 12 साल के बाद नए क्षितिज का निर्माण होना चाहिए, आशा के विरुद्ध दिशा से किसी कवि को उतरना चाहिए. मैं चाहता हूं कि तुम अपने आप से एक प्रश्न करो कि तुमने अपने हिस्से के नए क्षितिज का निर्माण कर लिया या वह काम अभी बाकी है. मेरे ख्याल से तुम्हारा क्षितिज अभी तक पूर्ण रूप से उभर कर सामने नहीं आया है.
और कवि की संकीर्णता की वृद्धि कवि सम्मेलनों में होती है, यह तुम जान लो. हम सभी लोगों को भागना चाहिए इन सम्मेलनों से. मैं तो कोशिश करके हार गया मगर कवि सम्मेलनों से छुटकारा नहीं मिलता. बेबसी है. फिर भी जिस सत्य को अनुभव करता हूं वह तुम्हे बता रहा हूं. मैं तुम्हारा गुरु नहीं, अग्रज नहीं, एक पीठ का भाई हूं, इसलिए हर बात कह सकता हूं और तुम्हें भी यही अधिकार देता हूं.
बक गया हूं जुनूं में क्या क्या कुछ, कुछ न समझे खुदा करे कोई  
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उन्होंने कई रचनाओं पर अपनी बेबाक राय रखी और बेहतरी के सुझाव भी दिए. 
श्री लक्ष्मीकांत शर्मा  ‘मुकुर’ को पत्र – 11-11-41

प्रिय  मुकुर
तुमने जो कविताएं मुझे दिखलाई थी उनमे छंदो भंग और यतिभंग  के दोष हैं.  यह दोष ऐसे होते हैं जिन्हें  रचयिता को स्वमेव  दूर करना चाहिए. तुम जिस छन्द  में कविता लिखना चाहते हो उसी छंद की कोई कविता कई बार पढ़ो और उसकी लय अपने कंठ में उतार लो. इसके बाद गा गा कर कविता लिखो और अपनी हर पंक्ति को कंठाग्र छंद की लय से मिलाते चलो. जहां छंद की लय का साम्य न  होगा वहां यतिभंग होगा. छंद का अभ्यस्त कर्ण कह देगा कि अमुक स्थल पर यति भंग है.

खूब पढ़ो. कवि के लिए कोई भी विषय वर्जनीय नहीं है. वह यदि गणितज्ञ हो तो सोने में सुगंध होगी.

जहां रचनाएं उन्हें पसंद आईं, वहां जी भर के तारीफ़ भी की 

श्री रामसिंहासन सहाय ‘मधुर’ तो पत्र – 10-9-48

मैं तो आपकी हाल की कविताओं पर दंग हूं. सच पूछिए तो यह कविताएं मेरी अपनी मनोदशा को ही व्यंजित करती हैं और जी चाहता है कि काश इनमें से कई के नीचे रचयिता की जगह मेरा नाम होता. इन्हें कई मित्रों को सुना चुका हूं. कल शाम को पूरी कॉपी जयप्रकाश जी के यहां ले गया था और उन्हें तथा अन्य मित्रों को कोई 15 कविताएं सुनाई. सभी लोग बड़े ही चमत्कृत हुए.

डा० कृष्णबिहारी सहल को पत्र – 22-1-70

‘अहं और आत्मबोध’ की कवितायेँ एक बार में पढ़ गया. कविता वह, जिसे ख़त्म करके जी करे कि फिर पढूं और कहानी वह, जिसे ख़त्म करके जिज्ञासा हो कि आगे क्या हुआ. आपकी कवितायेँ पढ़ कर जी चाहता है उन्हें फिर से पढूं. यह आपकी सफलता है.


दिनकर अपनी आलोचनाओं से कभी विचलित नहीं हुए, उन्होंने इसे सराहा ही और ये उनके विभिन्न पत्रों से साबित होता है.

आचार्य कपिल को पत्र - 31-8 -51

अभी-अभी हुंकार आया है. उसमें प्रभात जी ने बड़ी उल-जुलूल बातें लिखी हैं. अब आपके शत्रु और भी बढ़ेंगे.  निराला जी ने कहा है

यह हिंदी का स्नेहोपहार 

तो ये सारे उपहार लेने पड़ेंगे. बंधुओं की दलील है ग्रुप में रहो नहीं तो चैन से लिखने नहीं देंगे. दुर्भाग्यवश 2, 3 आदमी भी ऐसे नहीं हैं जिन्हें मैं  अपनी गुट का कह सकूं. अगर मेरी कोई गुट है तो उसका एकमात्र सदस्य मैं ही हूँ.

आचार्य कपिल को पत्र - 29 – 1 – 51

कामेश्वर फूले फले और बढ़ें,  यह मेरी कामना पहले भी थी और अब भी है .उन्हें मैं यह भी छूट देता हूं कि वह दिनकर काव्य के विरोधी के रूप में अपना विकास करें और उन्हें बुरा ना लगे तो मेरे साथ एक थाली में बैठकर भोजन भी करें, मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी. किंतु उन्हें और प्रत्येक लेखक को चाहिए कि वस्तुस्थिति को देख कर बोले और लिखें, जिससे किसी की पद मर्यादा को अनुचित जर्ब नहीं पहुंचे. पटना में एक साहित्यिक षड्यंत्र चल रहा है जिसका केंद्र यह कल्पित बात है कि दिनकर बिहार के सभी साहित्यकों का बाधक है और कुछ लोगों के खिलाफ तो उसकी फौज खड़ी रहती है. जब उमा मुझ पर आक्रमण करें, बेनीपुरी मुझ पर चोट करें, प्रदीप मेरे विरुद्ध लेख छापे और कामेश्वर मेरे विरुद्ध लिखे तब लोग न जाने किसे मेरी फौज का आदमी समझते हैं. मुझे लगता है रामेश्वर जी इस भ्रम में है कि दिनकर का विरोध करने से निष्पक्ष आलोचक के रूप में वे पूजे जायेंगे. इसे तो मैं घोर भ्रम समझता हूं और जिस निर्णय पर मैं 15 वर्षों के बाद पहुंचा हूं उस पर वह भी कभी ना कभी आएंगे. कुरुक्षेत्र के विरुद्ध चाहे तो वो एक लेखमाला आरम्भ कर दें, जिसके लिए स्थान में ‘राष्ट्रवाणी’ में ही दिलवा दूंगा. मगर ईश्वर के नाम पर वे भाषा में शिष्टता लाएं और कोई ऐसा काम ना करें जिससे उन्हें बाद को चलकर लज्जित होना पड़े.

मैंने उन्हें आत्मीय समझा है इसीलिए ये बातें लिख रहा हूँ. प्रेमी भी परस्पर एक दूसरे की आलोचना कर सकते हैं किन्तु ऐसी भाषा में नहीं जिससे जग हंसाई हो. मैंने जीवन भर में किसी आलोचक के लिए कोई पत्र नहीं लिखा था, यह पहला पत्र है. साहित्य में विचार स्वातंत्र्य रहना चाहिए मगर गाली-गलौज या मुंह चिढ़ाना विचार स्वातंत्र्य नहीं है.

श्री बनारसीदास चतुर्वेदी को पत्र – 6-1-36
अपने मित्रों में मैं जरा इमोशनल कहलाता हूं इसीलिए लोग मुझे ऐसी बात कहने या ऐसी चीज दिखाने से डरते हैं जिससे मुझे दुख होने की संभावना हो. अभी हाल ही में मैं शिवपूजन जी से मिला था. तब तक साप्ताहिक विश्वमित्र में निर्झरिणी की निंदा छप चुकी थी. शिवपूजन जी ने मुझे वह लेख देखने नहीं दिया. कहने लगे जब लोग तुम्हारी निंदा खुलकर करने लगे तब तुम समझो कि तुम्हारी लेखनी सफल हुई. इसे तो मैं अपना सौभाग्य ही समझता हूं कि भाव, कुभाव, अनख, आलसहूँ ‘रेणुका’ का नाम दस भले लोगों के मुंह पर आ जाता है.

आप विश्वास रखें आप पूज्यों की कृपा से मुझ में इतनी ताकत जरूर है कि अखबारों में रोज निकलने वाली पंक्तियां मुझे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती. कोई प्रशंसा ऐसी नहीं जो मुझे याद रहे, कोई निंदा ऐसी नहीं जो मुझे उभार दे.  नास्ति का परिणाम नास्ति है. कुछ नहीं से कुछ की उत्पत्ति नहीं हो सकती.

मैं रेणुका के दोषों को भली भांति जानता हूं. उसमें कलाविदों को पद पद पर अनुभवहीनता, इमैच्युरीटी  और कहीं-कहीं भाषा संबंधी कमजोरियां मिलेंगी. कीट्स के शब्दों में It is a foolish attempt, rather than a deed accomplished.

मैं जो कुछ चाहता हूं जो कुछ सोचता हूं उसे ठीक मनचाहे रूप में अब तक उभार नहीं सका हूं. इस चेष्टा का एक अस्पष्ट रुप मेरी आंखों के सामने बराबर टंगा रहता है. इधर मुझे ऐसा जान पड़ता है की शुद्ध भाषा लिखने की ट्रेनिंग मुझे और लेनी चाहिए. भरसक कोशिश कर रहा हूं. कविताएं शिवपूजन जी से दिखाकर छपाया करूंगा. आप इस विचार को कैसा समझते हैं ? मेरे विचार से शिवपूजन जी की जैसी चार्टर्ड हिंदी लिखने वाला विरला ही होगा.

लेखक के रूप में दिनकरजी सदा पाठकों की तरफ से सोचते रहे. उनके कुछ पत्र इशारा करते हैं की किस तरह उन्होंने छोटी छोटी बातों का ख्याल रखा.

आचार्य शिवपूजन सहाय को पत्र – 15-8-38

छपाई के विषय में आप और महारथी जी हैं ही, मुझे कुछ करना नहीं रह जाता.  तो भी आवरण पर का चित्र कुछ स्थूल है. उजले या हल्के रंग के आवरण पर रेखाचित्र रहता तो अधिक सुंदर होता. क्या इसका आकार छोटा नहीं किया जा सकता? दाम दो रुपए रख रहे हैं तो पृष्ठ संख्या कम से कम 150 होनी चाहिए और कागज भी ऐसा होना चाहिए कि ₹2 के लायक हो. आकार भी भारी भरकम हो. छपाई को घनी रखना अच्छा नहीं लगता उसे अधिक पतली कर दीजिएगा 

आचार्य कपिल को उनकी पत्रिका ‘प्राची’ के सम्बन्ध में पत्र – 24-4-51

आवरण पर से आप मिट्टी के छोटे माधव को हटा ही दें. भीतर संकलन और संपादन में जो गांभीर्य है उसके अनुरूप ऊपर का आवरण सादा ही रहना चाहिए अथवा हल्की रेखाओं में कोई छोटा स्केच रहे तो ठीक है. आपका उद्देश्य कदाचित यह है कि शिक्षण संस्थाओं में जो प्रश्न और समस्याएं हैं डटकर उन्हीं पर प्रकाश डाला जाए. यह एक उपयोगी काम है मगर स्टैंडर्ड को जरा ऊपर ले जाइए तथा इस प्रकार की समस्याओं पर भी लेख लिखवाईए जैसे
१.     छायावाद का जन्म कब हुआ तथा उसके आदि कवि कौन है?
२.      नई कविता हिंदी की परंपरा में आई है अथवा आकस्मिक रुप से?
३.      हिंदी गद्य के क्षेत्र में उस नेतृत्व को प्रधानता मिलनी चाहिए जो बालकृष्ण भट्ट, बालमुकुंद गुप्त तथा गुलेरी जी के द्वारा दिया गया अथवा उसे जो रामचंद्र शुक्ल एवं प्रसाद की देन है.
४.      यह बात कहां तक ठीक है कि उर्दू में से फारसी और अरबी शब्दों को हटा कर हिंदी बना दी गई है?
५.      रसवादी आलोचना पद्धति में क्या संशोधन किया जाए की वह आधुनिक साहित्य की व्याख्या में सफल हो?
६.      रीतिकालीन साहित्य का मूल्यांकन, नई समीक्षा की कसौटी पर
७.     भाषा सम्बन्धी दुष्प्रयोगों पर रोक लगाने के लिए आंदोलन       

साहित्य जगत में इतना बड़ा नाम होने के बाद भी, दिनकरजी स्वभाव से सरल रहे.

संपादक – धर्मयुग 1972 

सेक्सपियर ने तीन तरह के बड़ों का उल्लेख किया है. एक वह जो बड़ा पैदा होता है, दूसरा वह जो बड़प्पन हासिल करता है और तीसरा वह जिसपर बड़प्पन  थोप दिया जाता है. एक चौथा व्यक्ति भी हो सकता है जो बड़े वंश का होने के कारण  या साधन संपन्न होने के कारण बड़प्पन को दबोच लेता है.  अपने जानते मैं इनमें से किसी भी कोटि में नहीं आता हूं असल में मैं महान-टहान  हूं ही नहीं. मैं तो मामूली गृहस्त हूं जो नौकरियां करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता रहा है और वंश में जन्मी कन्याओं का विवाह रचवाता  रहा है. कुरुक्षेत्र और उर्वशी की रचना मेरी असली उपलब्धि नहीं है. मेरी वास्तविक उपलब्धि यह है कि परिवार के शकट को हाँफ- हाँफ कर खींचते हुए मैंने 9 लड़कियों के ब्याह रचवाएं हैं, अगर यह मेरी महत्ता है तो मैं उसे स्वीकार करता हूं.

श्री राजेन्द्र प्रसाद सिंह को पत्र – 10-2-70

1964 में जब मुझे सब रजिस्ट्रार का ऑफर आया, बेनीपुरी ने सलाह दी कि कुबूल मत करो. सरकारी नौकरी में जाकर अपने कवि की हत्या ही करोगे. यह बहुत ही नेक सलाह थी. लेकिन मैं उस पर चल नहीं सका.  सारी जिंदगी परिवार की गरीबी से जूझने में बीत गई. जिस समय लोग ताश और बैडमिंटन खेलते हैं, उस समय को भी मैंने साहित्य में लगाया. बस इतना ही काम  मुझसे हो सका और कृति मुझे क्षमता से अधिक मिल गई. कारण शायद यह था कि मैंने अपने आप को अमरता के अयोग्य पाकर उन कामों को खूब मनोयोग से किया जिनकी मुझ में योग्यता थी. अमर बनने का मंसूबा पालता तो वह काम भी नहीं हो पाता जिसे ईश्वर ने मुझसे करवा लिया है. जिस युग में पैदा हुआ उसकी योग्यता और सम्मान को समझने में मैंने गलती नहीं की है, इसका मुझे विश्वास है. मुश्किल यह है कि निराला के आए बिना साहित्य की परिधि विस्तृत नहीं हो पाती, किंतु हर आदमी निराला बनने की कोशिश में फस जाए तो साहित्य ठिठक जाएगा. बस इतना ही आत्मज्ञान हम सबको हासिल करना है

डा० विवेकीराय को पत्र – 1 – 1 -  58 

शासन की छाया मेरे लिए नहीं है. हां मेरे आलोचकों को यह बुरा अवश्य लगा कि मैं संसद का सदस्य क्यों हो गया. मैं स्कूल का शिक्षक था, सब रजिस्ट्रार था, युद्ध के समय प्रचार अफसर था, कांग्रेसी सरकार का प्रचार अफसर था और सबके बाद में प्रोफेसर. क्या यह सभी पद रचनात्मक प्रतिभा के उपयुक्त हैं?  और तो और आपने प्रोफेसरी करते हुए कितने कवियों को अच्छी कविताएं लिखते देखा है? मगर जब मैं इन पदों पर था लोग समझते थे मैं ठीक जगह पर हूं. केवल उन्हें लगता है कि मैं खतरों के बीच हूं. ठीक जगह कवि को कहां मिलती है? कविता का मेल किसी भी पद से नहीं बैठता और साहस तथा शक्ति हो तो सभी पदों से बैठता है. कम से कम मेरा तो यही अनुभव है, नौकरी (और उसके साथ लक्ष्य मूल पेंशन) का मोह मैंने 1952 में छोड़ी, तब से मेरी पुस्तकें कौन कौन सी निकली हैं -  नील कुसुम, संस्कृति के चार अध्याय, नीम के पत्ते, दिल्ली, रेती के फूल, चक्रवाल, उजली आग, .... 5 साल में 14 पुस्तकें क्या कम होती हैं? मगर अब हिंदी में पढ़ता कौन है?

बिहार में जाति प्रथा और उसके दुष्प्रभाव से भी वे चिंतित रहे 

श्री रामसागर चौधरी को  पत्र – 4-3-61

अपनी जाति का आदमी अच्छा और दूसरी जाति का बुरा होता है यह सिद्धांत मानकर चलने वाला आदमी, छोटे मिजाज का आदमी होता है. आप लोग, यानी सभी जातियों के नौजवान, इस छोटे पन से बचिए.  प्रजातंत्र का नियम है कि जो नेता चुना जाता है सभी वर्गों के लोग उससे न्याय की आशा करते हैं. कुख्यात प्रांत बिहार को सुधारने का सबसे अच्छा रास्ता यह है कि लोग जातियों को भूलकर गुणवान के आदर में एक हों.  याद रखिए कि एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता. वह बहुतों के समर्थन से चलता है. यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे, तो बिहार का सार्वजनिक जीवन गल जाएगा.

वीर रस का कवि होते हुए भी गांधीजी के प्रति उनका बहुत आदर रहा. भारत पाकिस्तान के बंटवारे से उन्हें दंश पहुंचा था. पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग हो जाने के बाद उन्होंने आचार्य कपिल को पत्र लिखा था

आचार्य कपिल को पत्र - 21-12-71

स्थान का अखाड़ा छोटा, काल का अखाड़ा बड़ा होता है. बड़े अखाड़े के पहलवान, छोटे अखाड़े में लड़े तो उनके हारने का डर रहता है. गांधीजी जिन्ना से स्थान के अखाड़े में लड़े थे इसलिए वे हार गए. नगर बांग्लादेश का अखाड़ा काल का अखाड़ा है. मुक्ति वाहिनी काल के उदर से जन्मी हुई फौज है. इस अखाड़े में जीत गांधी की हुई है, जिन्ना हार गए हैं. आपको मेरा एक पद याद है?
 स्थान में संघर्ष हो तो क्षुद्रता भी जीतती है
पर संयम के युद्ध में वह हार जाती है
जीत ले दिक् में जिन्ना
, पर अंत में बापू, तुम्हारी
जीत होगी काल के चौड़े अखाड़े में

संतोष की बात है कि मैंने जीते जी अपनी भविष्यवाणी को सच होते देख लिया.

हिंदी को कठिन संस्कृत के शब्दों से बाहर निकाल कर उसे जन मानस में व्यापक स्वीकार्यता दिलाने पर उनका सदैव प्रयास रहा. धर्मयुग के संपादक तो लिखे उनके पत्र में ये विषय समाहित है.

संपादक – धर्मयुग 1972 
मुख्य विषय यह है कि हिंदी को संस्कृत निष्ठ होना चाहिए या नहीं. पूज्य पंडित मदन मोहन मालवीय के चरणों तक पहुंचने का सुयोग मुझे नहीं मिला था, किंतु पूजनीय टंडन जी की संगति मुझे थोड़ी मिली थी. टंडन जी आसान हिंदी के पक्ष पाती थे,  मैं भी आसान हिंदी चाहता हूं और मानता हूं यह आदर्श हिंदी अमृतलाल नागर लिख रहे हैं, कमलेश्वर लिख रहे हैं, हरिशंकर परसाई लिख रहे हैं और सबसे बढ़कर अमृतराय लिख रहे हैं. किंतु हुआ क्या? संसदीय कार्यों के लिए जब-जब हिंदी शब्दों की जरूरत पड़ी, स्पीकर महोदय ने विद्वानों की एक बड़ी समिति का निर्माण किया और टंडन जी को उसका अध्यक्ष बना दिया. इस समिति में भारत के सभी भाषाओं के विद्वान रखे गए थे और समिति की कोशिश यह थी कि शब्द जहां तक संभव हो आसान रखे जाएं. किंतु हिंदी के प्रतिनिधियों की समिति में चली नहीं. अहिंदी भाषी विद्वान कदम कदम पर अड़ते रहे कि शब्द संस्कृत के ही होने चाहिए नहीं तो उन्हें सार्वदेशिक स्वीकृति नहीं मिलेगी और अंततः समिति ने जो शब्दकोश तैयार किया उसमे बहुलता संस्कृत शब्दों की ही रही.
इतने दिनों का मेरा अनुभव यह बतलाता है कि या तो हिंदी राजभाषा के रुप में सफल ही नहीं होगी या होगी तो संस्कृतनिष्ठ  होकर ही होगी

दिनकरजी, अपनी प्रशंसा से सदैव बचते रहे पर एक पत्र में उन्होंने अपनी ख़ुशी जाहिर की है. पर यहाँ भी उनकी ख़ुशी एक कवि के रूप में उनको मिले सम्मान से है न की व्यक्तिगत प्रशंसा से.

ब्रज किशोर नारायण को पत्र पोलैंड से – 29-11-55

रात जब मैं कविता पढ़ने को उठा तो मुझ पर नशा छा गया. न जाने संस्कृत निष्ठ हिंदी का प्रभाव था या उस छंद का चमत्कार या मेरे स्वर में सरस्वती प्रविष्ट हो गई थी. जब तक मैं कविता पढ़ता रहा लोग आनंद से झूमते रहे और ज्यों ही  पढ़ना खत्म किया कि तालियों की भयानक गड़गड़ाहट शुरू हो गई जो देर तक चलती रही. 
जो कुछ देख रहा हूं उससे विचारों की नींव पर बुरा असर पड़ रहा है. शक्ति के बिना अनुशासन नहीं, अनुशासन के बिना काम नहीं और काम के बिना प्रगति नहीं. यहां के कवि और कलाकार देश के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हैं. वहां भारत में हम मिनिस्टर से भी सस्ते और आलू गोभी से भी हीन माने जाते हैं .
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उनके लिखे हजार से भी ऊपर पत्र, आज की पीढ़ी के लिए उतने ही अमूल्य धरोहर हैं जितने की उनके द्वारा लिखे गए साहित्य.   










प्रवीण प्रणव


Monday, 4 July 2016

हैदराबाद के क्रांतिकारी शायर मखदूम को मेरी श्रद्धांजलि - प्रवीण प्रणव


दक्षिण भारत में पैदा हुए उर्दू शायरों में शायद सबसे अधिक प्रसिद्धि मखदूम मोहिउद्दीन को प्राप्त हुई। 4 फ़रवरी 1908 को तत्कालीन हैदराबाद रियासत के अन्डोल गाँव में (अब जिला मेडक में) जन्मे मखदूम मोहिउद्दीन एक प्रतिष्ठित क्रांतिकारी और बहुमुखी प्रतिभा के शायर थे। उनका पूरा नाम अबू सईद मोहम्मद मखदूम मोहिउद्दीन हुज़री था।


मखदूम का बचपन बहुत सुखद नहीं रहा। जब वह सिर्फ छह साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई और उनकी माँ ने दूसरी शादी कर ली। मखदूम ने मस्जिद में झाडू  लगाने का भी काम किया और नमाजियों की खिदमत की. फिर उनके चाचा ने उन्हें गोद ले लिया और उनकी परवरिश की। यहाँ से उनकी जिंदगी में तबदीली आई. उनके चाचा ने उनकी परवरिश अच्छे से की  और उनकी शिक्षा का प्रबंध किया. मखदूम को बच्चों से बहुत लगाव रहा. चुकि वो  खुद बहुत कम उम्र में यतीम ही गए थे इसलिए बच्चों की भावनाओं का उन्हें खास ख्याल रहा.


मखदूम की आरंभिक शिक्षा गाँव में हुई और उच्च शिक्षा के लिए वे हैदराबाद आ गए जहां से उन्होंने स्नातक और स्नातोकत्तर किया. पढाई पूरी करने के बाद बे हैदराबाद में ही रहने लगे और ब्रिटिश रुल के खिलाफ “फ्री इंडिया” आन्दोलन से जुड़ गए. 1936 में उन्होंने ओस्मानिया विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की. 

मखदूम ने 1934 में सिटी कॉलेज में उर्दू साहित्य के प्राध्यापक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। वह एक बहुमुखी प्रतिभा के कवि थे। वे भारत के आंध्र प्रदेश राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक थे। उनके नाम पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के हैदराबाद स्थित दफ़्तर को मखदूम भवन के नाम से भी जाना जाता है। बाद में वे हैदराबाद रियासत के भारत के साथ विलय के लिए हैदराबाद रियासत के तत्कालीन राजशाही के खिलाफ लामबंद हो गए। हैदराबाद के तत्कालीन शासक, मीर उस्मान अली खान (निजाम) ने स्वतंत्रता के लिए लोगों को उत्साहित करने के कारण उन्हें जान से मारने का आदेश दिया था।



उनकी प्रसिद्ध नज़्म सिपाही में एक सिपाही का दर्द और परिवेश साफ़ झलकता है.  



जाने वाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है

कौन दुखिया है जो गा रही है
भूखे बच्‍चों को बहला रही है
लाश जलने की बू आ रही है
ज़िंदगी है कि चिल्‍ला रही है

कितने सहमे हुए हैं नज़ारे
कैसे डर डर के चलते हैं तारे
क्‍या जवानी का खून हो रहा है
सुर्ख हैं आंचलों के किनारे

गिर रहा है सियाही का डेरा
हो रहा है मेरी जाँ सवेरा
ओ वतन छोड़कर जाने वाले
खुल गया इंक़लाबी फरेरा



देशभक्ति से ओतप्रोत एक और प्रसिद्ध गीत



कहो हिन्दुस्ताँ की जय



कहो हिन्दुस्ताँ की जय । कहो हिन्दुस्ताँ की जय । कहो हिन्दुस्ताँ की जय ।

         क़सम है ख़ून से सींचे हुए रंगी गुलिस्ताँ की
         क़सम है ख़ूने दहकाँ की, क़सम ख़ूने शहीदाँ की ।
         ये मुमकिन है के दुनिया के समुन्दर ख़ुश्क हो जाएँ
         ये मुमकिन है के दरिया बहते-बहते थक के सो जाएँ ।
         जलाना छोड़ दें दोज़ख़ के अंगारे ये मुमकिन है
         रवानी तर्क कर दे बर्क़ के धारे ये मुमकिन है ।
         ज़मीने पाक अब नापाकियों को ढो नहीं सकती
         वतन की शम्मे आज़ादी कभी गुल हो नहीं सकती ।

कहो हिन्दुस्ताँ की जय । कहो हिन्दुस्ताँ की जय । कहो हिन्दुस्ताँ की जय ।

         वो हिन्दी नौजवाँ याने अलम्बरदारे आज़ादी
         वतन का पासबाँ वो तेग-ए जौहरदारे आज़ादी ।
         वो पाक़ीज़ा शरारा बिजलियों ने जिसको धोया है
         वो अंगारा के जिसमें ज़ीस्त ने ख़ुद को समोया है ।
         वो शम्म-ए ज़िन्दगानी आँधियों ने जिसको पाला है
         एक ऐसी नाव तूफ़ानों ने ख़ुद जिसको सम्भाला है ।
         वो ठोकर जिससे गीती लरज़ा बर‍अन्दाम रहती है ।

कहो हिन्दुस्ताँ की जय । कहो हिन्दुस्ताँ की जय । कहो हिन्दुस्ताँ की जय ।

         वो धारा जिसके सीने पर अमल की नाव बहती है ।
         छुपी ख़ामोश आहें शोरे महशर बनके निकली हैं ।
         दबी चिंगारियाँ ख़ुरशीदे ख़ावर बनके निकली हैं ।
         बदल दी नौजवाने हिन्द ने तक़दीर ज़िन्दाँ की
         मुजाहिद की नज़र से कट गई ज़ंजीर ज़िन्दाँ की ।

कहो हिन्दुस्ताँ की जय । कहो हिन्दुस्ताँ की जय । कहो हिन्दुस्ताँ की जय ।





हैदराबाद के भारत विलय के बाद वे 5 वर्षों  तक आंध्र प्रदेश विधानसभा के सदस्य भी रहे। इस दौरान उन्होंने रूस और चीन सहित कई कम्युनिस्ट देशों की यात्रा भी की। उन्होंने रूस में युरी गागरिन से भी मुलाक़ात की जो  अंतरिक्ष में जाने वाले पहने इंसान थे और इस मुलाक़ात के बाद मखदूम ने गागरिन के लिए एक कविता भी लिखी थी.



मुबारक तुझे ओ ज़मीं के मुसाफ़िर
ज़मीं व ज़माँ की हदें तोड़ कर
आसमानों पे जाना
हवाओं से आगे
, ख़ुलाओं से आगे
मह व कहकशाँ की फ़िज़ाओं से आगे
मुबारक सितारों की चिलमन हटाना
सरे जुल्फ़े नाहीद को छू के आना
दिले इब्ने आदम की धड़कन सुनाना
मुबारक तुझे ओ ज़मीं के मुसाफ़िर
ज़मीं व ज़माँ की हदें तोड़ कर
आसमानों पे जाना ।





आजादी के बाद और राज्यों के निर्धारण के बाद मखदूम साहित्यिक गतिविधियों में लगे रहे. उनकी रचना बिसात-ए-रस्क के लिए उन्हें 1969 में  उर्दू साहित्य एकेडमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, इसी वर्ष उनका देहांत भी हो गया. उनकी रचनाओं के अलावा टैगोर पर उनके लिखे लेख और काब्य नाटक “होश के नाखून” प्रमुख रहे. बिसात-ए-रस्क, मखदूम के दो संग्रह सुर्ख सवेरा (1944) और गुल-ए-तर (1961) का संकलन है. मखदूम को शायर-ए-इन्किलाब के खिताब से भी नवाज़ा गया. उनके ग़ज़ल और गीत कई हिंदी फिल्मों में लिए गए. एक चमेली के मंडवे तले, आप की याद आती रही रात भर, फिट छिड़ी रात बात फूलों की कुछ प्रमुख गीत हैं. आजादी के लिए बगावत करने के लिए मखदूम को जेल भी जाना पड़ा लेकिन वहां भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा. जेल में कागज़ कलम नहीं मिलने पर उन्होंने जेल की दीवारों पर कोयले तक से नज़्म लिखे.

ऐसा नहीं है कि मखदूम ने सिर्फ क्रांति पर ही लिखा, उन्होंने बहुत ही रूमानी नज़्म, गीत और ग़ज़ल भी लिखे. लेकिन रूमानी रचनाओं में भी, बेहतर कल के ख्वाब और उम्मीदों का असर दिखता रहा. या यूँ कहें कि कुछ क्रांति की रचनाएं रूमानियत के साथ लिखी गईं.  


रक़्स

वो रूप रंग राग का पयाम ले के आ गया
वो कामदेव की क्मान जाम ले के आ गया

वो चाँदनी की नर्म-नर्म आँच में तपी हुई
समन्दरों के झाग से बनी हुई जवानियाँ
हरी-हरी रविश पे हमक़दम भी हमकलाम भी

बदन महक-महक के चल
कमर लचक-लचक के चल
क़दम बहक-बहक के चल

वो रूप रंग राग का पयाम ले के आ गया
वो कामदेव की कमान जाम ले के आ गया



ख़्वाहिशें

ख़्वाहिशें
लाल
, पीली, हरी, चादरें ओढ़ कर
थरथराती
, थिरकती हुई जाग उठीं
जाग उठी दिल की इन्दर सभा
दिल की नीलम परी
, जाग उठी
दिल की पुखराज
लेती है अंगड़ाईयाँ जाम में
जाम में तेरे माथे का साया गिरा
घुल गया
चाँदनी घुल गई
तेरे होंठों की लाली
तेरी नरमियाँ घुल गईं
रात की
, अनकही, अनसुनी दास्ताँ
घुल गई जाम में
ख़्वाहिशें
लाल
, पीली, हरी, चादरें ओढ़ कर
थरथराती
, थिरकती हुई जाग उठीं ।



आज की रात न जा
रात आई है, बहुत रातों के बाद आई है
देर से दूर से आई है
, मगर आई है ।
मरमरी सुबह के हाथों में छलकता हुआ जाम आएगा
रात टूटेगी उजालों का पयाम आएगा ।
आज की रात न जा ।



मखदूम ने राबिया बेगम से निकाह किया और उनके तीन बच्चे हुए. ज़किया बेगम उनकी सबसे बड़ी बेटी थीं. उनके बड़े बेटे का नाम नुसरत मोहिउद्दीन है जो स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद के मुलाजिम रह चुके हैं. इसके साथ ही वे एक जाने माने शायर, CPI के सदस्य और इन्साफ तहरीक के सचिव भी रहे. उनके दूसरे बेटे का नाम ज़फर मोहिउद्दीन है जो सिंगरेनी कोल् माइन्स के लिए काम करते हैं. 


मखदूम हैदराबाद के हरदिलअज़ीज़ शायर थे। वे बड़े ही मिलनसार और खुशमिज़ाज बल्कि हँसोड़ किस्म के आदमी थे। वे न केवल शायरी के कद्रदानों बल्कि सामान्य रिक्शेवालों, होटलों के बेयरों, छोटे बच्चों, घरेलू औरतों तक से एक सी बेतक़ल्लुफी से मिलते थे। मखदूम की लोकप्रियता डा० ज़ीनत साज़िदा के शब्दों में कुछ ऐसी थी, “मोगलपुरे के नौजवानों से लेकर चिक्कड़-पल्ली के मज़दूरों तक जिस को देखिये एक फैशन सा बना लिया है कि मखदूम की मुहब्बत में मरे जा रहे हैं।“ खुद अपना मज़ाक उड़ाने में उनका कोई सानी नहीं था।


एक बार मखदूम अलसुबह ओरियेंट होटल पहुँचे और बेयरे से पूछा, “निहारी है?
बैरा बोला
, “नहीं है।“
मखदूम ने पूछा
, “आमलेट है?”
बैरा बोला
, “नहीं“
मखदूम ने फिर पूछा
, “खाने के लिए कुछ है?”
बैरे ने जवाब दिया
, “इस वक़्त तो कुछ नहीं है।“
इस पर मखदूम बोले
, “ये होटल है या हमारा घर कि यहाँ कुछ भी नहीं है!”


उनकी आदत थी कि कोई नई ग़ज़ल कहने के बाद फौरन किसी न किसी को सुना डालते थे। इस आदत को लेकर एक लतीफा वे खुद ही सुनाया करते थे

एक दिन उनसे ग़ज़ल हो गई तो फौरन ओरियेंट होटल चले आए कि कोई माई का लाल मिल जाए तो उसे ग़ज़ल सुनाएं। यहाँ कोई न मिला तो ’सबा’ के दफ़्तर चले गए। वहाँ भी कोई न मिला। थक-हार कर चाइनीज बार में चले गए। बार के बैरे क़ासिम को बुला कर कहा, “दो पैग व्हिस्की ले आओ।” क़ासिम व्हिस्की ले आया तो उससे बोले, “बैठो और व्हिस्की पियो।“ क़ासिम शरमाता रहा मगर वो अड़े रहे। आखिर उसने खड़े-खड़े व्हिस्की पी ली। फिर बोले, “दो पैग व्हिस्की और ले आओ।” दूसरे दौर में भी उन्होंने क़ासिम को व्हिस्की पिलाई। फिर तीसरा दौर चला। इसके बाद मखदूम ने क़ासिम से कहा, “अच्छा क़ासिम! अब मेरे सामने बैठो, मैं तुम्हें अपनी ताज़ा ग़ज़ल के कुछ शे’र सुनाना चाहता हूँ।“

यह सुनते ही क़ासिम ने कहा, “साहिब, आप बहुत पी चुके हैं। आपकी हालत गैर हो रही है। चलिये, मैं आपको घर छोड़ आऊँ।“ मखदूम द्वारा अपनी होशमंदी के हजार सुबूत पेश करने के बाद भी क़ासिम ने उस रात उनकी ग़ज़ल नहीं सुनी।


मखदूम की एक नज़्म ’नया साल’ जिसमें उनका ये मसखरापन झलक मारता है:



करोड़ों बरस की पुरानी

कुहनसाल दुनिया

ये दुनिया भी क्या मस्खरी है!

नये साल की शाल ओढ़े

बसद तन्ज़, हम सब से ये कह रही है

कि मैं तो ’नई’ हूँ

हँसी आ रही है।



मखदूम अक्सर अपने परिचितों को जानबूझकर छेड़ते भी रहते थे। ऐसा ही एक किस्सा है:

एक बार मखदूम एक अन्य हैदराबादी शायर सुलेमान अरीब के घर पर मशहूर पेन्टर सईद बिन मुहम्मद के साथ बैठे थे। बातों के क्रम में वे बोले, “शाइरी मुसव्विरी से कहीं ज़्यादा ताकतवर मीडियम है।“


सईद बिन मुहम्मद ने जवाब दिया, “मुसव्विरी और शाइरी का क्या तकाबुल! शाइरी में तुम जो चीज बयान नहीं कर सकते, हम रंगों और फार्म में बयान कर देते हैं। तुम कहो तो सारी उर्दू शाइरी को पेन्ट कर के रख दूँ।“
मखदूम बोले, “सारी उर्द शायरी तो बहुत बड़ी बात है; तुम इस मामूली मिस्रे को ही पेन्ट कर दो –

पंखुड़ी इक गुलाब की सी है।“

सईद बिन मुहम्मद ने कहा, “ इसमें कौन सी बड़ी बात है; मैं कैनवास पर एक गुलाब की पंखुड़ी बना दूँगा।“
वे बोले, “पंखुड़ी गुलाब की तो पेन्ट हो गई, मगर ’सी’ को कैसे पेन्ट करोगे?”
सईद बिन मुहम्मद बोले, “’सी’ भी भला कोई पेन्ट करने की चीज है?”
मखदूम बोले, “मिस्रे की जान तो ’सी’ ही है। सईद! आज मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा जब तक तुम ’सी’ को पेन्ट नहीं करोगे।“

यह सुनते ही सईद बिन मुहम्मद भाग खड़े हुए।



क्रांति के रास्ते में अमूनन सफलताएं कम और दुश्वारियां ज्यादा हिस्से में आती हैं. मखदूम तो भी कई बार गुमनाम होना पड़ा. उनके कई नज्मों में इस सूनापन का असर साफ़ झलकता है.



शहर



ये शहर अपना

अजब शहर है कि

रातों में

सड़क पे चलिए तो

सरगोशियाँ सी करता है

वो ला के ज़ख्म दिखाता है

राज-ए-दिल की तरह

दरीचे बंद

गुल चुप

निढ़ाल दीवारें

किवाड़ मोहर-ब-लब

घरों में माय्यतें ठहरी हुई है बरसों से

किराए पर



ये शहर अपना
अजब शहर है कि
घरों में मय्यतें ठहरी हुई हैं बरसों से
किराए पर
राज़-ए-दिल की तरह
सड़क पे चलिए तो
गुल चुप
निढाल दीवारें
रातों में
सरगोशियाँ सी करता है
किवाड़ मोहर-ब-लब
दरीचे बंद
वो ला के ज़ख़्म दिखाता है 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13

ये शहर अपना
अजब शहर है कि
घरों में मय्यतें ठहरी हुई हैं बरसों से
किराए पर
राज़-ए-दिल की तरह
सड़क पे चलिए तो
गुल चुप
निढाल दीवारें
रातों में
सरगोशियाँ सी करता है
किवाड़ मोहर-ब-लब
दरीचे बंद
वो ला के ज़ख़्म दिखाता है 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13

ये शहर अपना
अजब शहर है कि
घरों में मय्यतें ठहरी हुई हैं बरसों से
किराए पर
राज़-ए-दिल की तरह
सड़क पे चलिए तो
गुल चुप
निढाल दीवारें
रातों में
सरगोशियाँ सी करता है
किवाड़ मोहर-ब-लब
दरीचे बंद
वो ला के ज़ख़्म दिखाता है



सन्नाटा



कोई धड़कन
न कोई चाप
न संचल
न कोई मौज
न हलचल
न किसी साँस की गर्मी
न बदन
ऐसे सन्नाटे में इक आध तो पत्ता खड़के
कोई पिघला हुआ मोती
कोई आँसू
कोई दिल
कुछ भी नहीं
कितनी सुनसान है ये रहगुज़र
कोई रुख़सार तो चमके
, कोई बिजली तो गिरे





वक़्त- बेदर्द मसीहा

दर्द की रात है
चुपचाप गुज़र जाने दो
दर्द को मरहम न बनाओ
दिल को आवाज़ न दो
नूर-ए-सहर को न जगाओ
ज़ख़्म सोते हैं तो सो रहने दो
ज़ख़्म के माथे से अम्य्तभरी उँगली न हटाओ
दिल को आराम
, फफोलों को सुकूँ मिलता है
वक़्त बेदर्द मसीहा है





सैयद मोहम्मद मेहदी, मखदूम साहब के दोस्त थे. उन्हें याद करते हुए मेहदी साहब ने कहा था कि मखदूम बहुत ही सुरीले थे. वे अपने हर नज़्म की धुन भी बनाते थे और बड़े सुर में गुनगुनाते थे.

एक दिलचस्प वाकया याद करते हुए उन्होंने बताया कि उन दिनों हर स्कूल में पहले निजाम की शान में एक तराना पढ़ा जाता था. मखदूम ने इस तराने के खिलाफ़ एक शेर लिख दिया जो बहुत प्रसिद्द हो गया. लोगों ने निज़ाम को सूचित किया कि मखदूम ने एक शेर लिखी है जिसकी वजह से अब जब भी ये तराना गाया जाता है तो लोग हंसने लगते हैं और इससे आपकी शान में गुस्ताखी हो रही है. निजाम ने उसके बाद तराना गाने का नियम रद्द कर दिया.   


एक और दिलचस्प वाकया उनके चुनाव लड़ने से जुड़ा है. मखदूम असेम्बली के चुनाव में खड़े थे और उन्हें लोगों का अपार समर्थन था. उनकी ही लिखी एक शेर है


हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो
चलो तो ज़माने को अपने साथ ले के चलो


उस चुनाव में लोगों ने इस शेर को एक दिलचस्प तरीके से बदल दिया और शहर की हर दीवार पर चस्पा कर दिया


हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो
चलो तो जनाने को अपने साथ ले के चलो


मतलब था कि चुनाव के दिन अपनी औरतों को भी अपने साथ ले जाएँ और मखदूम के लिए वोट डालें.

अमूनन कम ही होता है की कोई शायर दुसरे शायर की तारीफ़ करे लेकिन मखदूम इसके अपवाद थे. एक बार उन्होंने मेहदी साहब को सुवह सुवह फोन लगाया और पूछा कि आज के अखबार में मेरी ग़ज़ल पढ़ी? मेहदी साहब ने नहीं पढ़ी थी तो इन दोनों ने शाम में मिलने का प्रोग्राम बनाया. किसी होटल में शाम में मिले और जब अखबार पढ़ रहे थे तो उसी अखबार में फैज़ अहमद फैज़ की एक ग़ज़ल पर उनकी नज़र गई. उन्होंने तुरत उस ग़ज़ल की धुन बनाई और उसे गाते रहे. जब मेहदी साहब ने उन्हें बोला कि तुमने ग़ज़ल सुनाने को बुलाया था तो उन्होंने बात बदलते हुए बोला यही तो ग़ज़ल है इससे बढ़िया ग़ज़ल क्या होगी. उस शाम कई लोगों के आग्रह करने के बाद भी मखदूम ने अपनी कोई ग़ज़ल नहीं पढ़ी और फैज़ की उस ग़ज़ल को गुनगुनाते रहे. फैज़ की वो ग़ज़ल थी:


दिल ना उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है,
लम्बी है
ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है...!!!



इसी तरह फैज़ ने भी मखदूम को एक अव्वल दर्जे का शायर माना और उनका एहतराम किया. मेहदी साहब ने जब इस वाकये तो फैज़ के साथ साझा किया तो उनकी आँखें भर आई थी.



दूरदर्शन ने नामी साहित्यकारों की याद में एक कार्यक्रम “कहकशां” का निर्माण किया जिसमे मखदूम पर 8 भागों की श्रृंखला प्रसारित की गई.



मखदूम के कुछ प्रसिद्ध ग़ज़ल









रातभर दीद-ए-नमनाक में लहराते रहे
        साँस की तरह से आप आते रहे जाते रहे ।
ख़ुश थे हम अपनी तमन्नाओं का ख़्वाब आएगा
        अपना अरमान बर अफ़गंदा नक़ाब आएगा ।
नज़रें नीची किए शरमाए हुए आएगा
        काकुले चेहरे पे बिखराए हुए आएगा ।
आ गई थी दिले मुज़तर में शकेबाई -सी
        बज रही थी मेरे ग़मख़ाने में शहनाई-सी ।
पत्तियाँ खड़कीं तो समझा के लो आप आ ही गए
        सजदे मसरूर के मसजूद को हम पा ही गए ।
शब के जागे हुए तारों को भी नींद आने लगी
        आपके आने की एक आस थी अब जाने लगी ।
सुबह के सेज से उठते हुए ली अँगड़ाई
        ओ सबा तू भी जो आई तो अकेली आई ।
मेरे महबूब मेरी नींद उड़ाने वाले
        मेरे मसजूद मेरी रूह पे छाने वाले ।
आ भी जा ताके मेरे सजदों का अरमाँ निकले
        आ भी जा, ताके तेरे क़दमों पे मेरी जाँ निकले । कहो हिन्दोस्ताँ की जय
कहो हिन्दोस्ताँ की जय
क़सम है ख़ून-ए-दहक़ाँ की क़सम ख़ून-ए-शहीदाँ की
मुजाहिद की नज़र से कट गई ज़ंजीर ज़िंदाँ की
वतन की शम्-ए-आज़ादी कभी गुल हो नहीं सकती
कहो हिन्दोस्ताँ की जय
कहो हिन्दोस्ताँ की जय
वो हिन्दी नौजवाँ यानी अलम-बरदार-ए-आज़ादी
ये मुमकिन है कि दरिया बहते बहते थक के सो जाएँ
ये मुमकिन है कि दुनिया के समुंदर ख़ुश्क हो जाएँ
कहो हिन्दोस्ताँ की जय
कहो हिन्दोस्ताँ की जय
क़सम है ख़ून से सींचे हुए रंगीं गुलिस्ताँ की
छुपी ख़ामोश आहें शोर-ए-महशर बन के निकली हैं
इक ऐसी नाव तूफ़ानों ने ख़ुद जिस को सँभाला है
दबी चिंगारियाँ ख़ुर्शीद-ए-ख़ावर बन के निकली हैं
ज़मीन-ए-पाक अब नापाकियों को ढो नहीं सकती
कहो हिन्दोस्ताँ की जय
वो शम्-ए-ज़िंदगानी आँधियों ने जिस को पाला है
वतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादी
रवानी तर्क कर दें बर्क़ के धारे ये मुमकिन है
बदल दी नौजवान-ए-हिन्द ने तक़दीर ज़िंदाँ की
वो धारा जिस के सीने पर अमल की नाव बहती है
वो अँगारा कि जिस में ज़ीस्त ने ख़ुद को समोया है
वो पाकीज़ा शरारा बिजलियों ने जिस को धोया है
जलाना छोड़ दें दोज़ख़ के अंगारे ये मुमकिन है
वो ठोकर जिस से गीती लर्ज़ा-बर-अंदाम रहती है









सन्नाटा







आप की याद आती रही रात भर
चश्मे नम मुस्कुराती रही रात भर ।

रात भर दर्द की शम्मा जलती रही
ग़म की लौ थरथराती रही रात भर ।

बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा
याद बन बन के आती रही रात भर ।

याद के चाँद दिल में उतरते रहे
चाँदनी जगमगाती रही रात भर ।

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज़ आती रही रात भर ।







इश्क़ के शोलों को भड़काओ के कुछ रात कटे
दिल के अंगारे को दहकाओ के कुछ रात कटे ।

हिज्र में मिलने शब-ए-माह के ग़म आए हैं
चारसाज़ों को भी बुलवाओ के कुछ रात कटे ।

कोई जलता ही नहीं
, कोई पिघलता ही नहीं
मोम बन जाओ
, पिघल जाओ, के कुछ रात कटे ।

चश्मे-रुख़सार के अज़कार को जारी रखो
प्यार के नग़मे को दोहराओ के कुछ रात कटे ।

आज हो जाने दो हरएक को बदमस्त-ओ-ख़राब
आज एक-एक को पिलवाओ के कुछ रात कटे ।

कोहे ग़म और गिराँ और गिराँ और गिराँ
ग़मज़दो तीशे को चमकाओ के कुछ रात कटे ।









फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की ।

फूल के हार
, फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की ।

आपका साथ
, साथ फूलों का
आपकी बात
, बात फूलों की ।

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं
मिल रही है हयात फूलों की ।

कौन देता है जान फूलों पर
कौन करता है बात फूलों की ।

वो शराफ़त तो दिल के साथ गई
लुट गई कायनात फूलों की ।

अब किसे है दमाग़े तोहमते इश्क़
कौन सुनता है बात फूलों की ।

मेरे दिल में सरूर-ए-सुबह बहार
तेरी आँखों में रात फूलों की ।

फूल खिलते रहेंगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की ।

ये महकती हुई ग़ज़ल
'मख़दूम'
जैसे सहरा में रात फूलों की ।





  

25 अगस्त, 1969 को जब मखदूम की मृत्यु हुई तो हजारों लोग धाड़ें मार-मार कर रो रहे थे जैसे कि उनके परिवार से ही किसी की मृत्यु हो गई हो। उनके व्यक्तित्व और जीवन को उन्हीं के शब्दों में बयान करें तो:



एक शख़्स था ज़माना था के दीवाना बना
इक अफ़साना था अफ़साने से अफ़साना बना।



इक परी चेहरा के जिस चेहरे से आईना बना
दिल के आईना दर आईना परीखाना बना।

क़ीमि-ए-शब में निकल आता है गाहे-गाहे
एक आहू कभी अपना कभी बेगाना बना।

है चरागाँ ही चरागाँ सरे आरिज़ सरेज़ाम
रंग सद जलवा जाना न सनमखाना बना।

एक झोंका तेरे पहलू का महकती हुई याद
एक लम्हा तेरी दिलदारी का क्या-क्या न बना।



मखदूम के सरमाये में एक तरफ तो उनके क्रांतिकारी सरोकारों से जुड़ी शायरी है तो दूसरी ओर एक बड़ा भाग इससे अलग खालिस रूमानी शायरी का भी है। इस संदर्भ में मशहूर शायर ख़्वाज़ा अहमद अब्बास ने बिल्कुल ठीक कहा था कि, “मख़्दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूँदें भी, वे क्रांति के आवाहक थे और पायल की झंकार भी। वे ग्यान थे, वे कर्म थे, वे प्रग्या थे, वे क्रांतिकारी छापामार की बन्दूक थे और संगीतकार का सितार भी। वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी।“ हैदराबाद के इस महान क्रांतिकारी शायर को मेरा सलाम.

- प्रवीण प्रणव