कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद

दक्षिण भारत के हिन्दीतर क्षेत्र में विगत २ दशक से हिन्दी साहित्य के संरक्षण व संवर्धन में जुटी संस्था. विगत २२ वर्षों से निरन्तर मासिक गोष्ठियों का आयोजन. ३०० से अधिक मासिक गोष्ठियाँ संपन्न एवं क्रम निरन्तर जारी...
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Wednesday, 6 July 2016

यूँ तो प्रहरी से खड़े हैं, ये हिमालय हैं बड़े - रमा द्विवेदी

यूँ तो प्रहरी से खड़े हैं, ये हिमालय हैं बड़े
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े

शब्द गा सकते नहीं, तेरे जीवन की कहानी
देश के हित  झोंक दी है तूने पूरे जिंदगानी
देश का जन-जन ऋणी है, छाँव में जो तेरी पले
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े

यूँ तो प्रहरी से खड़े हैं, ये हिमालय हैं बड़े
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े ||

तुझसे ही तो यहाँ की हर कली मुस्काएगी
तेरे बिन.. तो यहाँ की हर गली सो जाएगी
तुम नहीं तो हम नहीं तुम हो हर दुवाओं से बड़े
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े

यूँ तो प्रहरी से खड़े हैं, ये हिमालय हैं बड़े
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े ||

जल-थल-नभ में तेरा रुतबा और तेरी ही शान है
तुझसे अपनी आबरू है और तुझी से आन है
तुम समन्दर और धरा, आकाश से भी तुम बड़े
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े

यूँ तो प्रहरी से खड़े हैं, ये हिमालय हैं बड़े
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े ||

यूँ तो प्यारा झंडा हमारा, झुकता नहीं है ये कभी
पर तेरे सम्मान में ये भी झुक जाता है हर कहीं
करते नमन शत-शत नमन हर साँस में तू ही चले
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े

यूँ तो प्रहरी से खड़े हैं, ये हिमालय हैं बड़े
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े

- रमा द्विवेदी !!

यादें जाने क्यों चली आती हैं - विनीता शर्मा

यादें जाने क्यों चली आती हैं
मैने तो उनको बुलाया नहीं था
कौन उदाता है नींद की चादर
मैने तो ख़ुद को सुलाया नहीं था

सपने भी देखे, मायूसी कम न हुयी
जिसका इंतज़ार था, आया नहीं था
बंद आँखों ने खुले सच को ही देखा
दरअसल वो मेरा था जिसे पाया नहीं था

थकी दहलीज़ ज़ख्मों सी रिसती दीवारें
न रिश्तों की धूप न प्यार की बौछारें
दरारों के आइने में झांकती तन्हाइयां
ये घर तो मेरा ही था पराया नहीं था

- विनीता शर्मा !!

Tuesday, 5 July 2016

छाप तिलक सब छीनी - अमीर ख़ुसरो

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैंना मिलाइ के
बात अघम कह दीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाइ के।

बल बल जाऊँ मैं तोरे रंगरिजवा
अपनी सी रंग दीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाइ के,
प्रेम बटी का मदवा पिलाय के मतवारी कर दीन्हीं रे
मोसे नैंना मिलाइ के।

गोरी-गोरी बइयाँ हरी - हरी चुरियाँ
बइयाँ पकर हर लीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाइ के
खुसरो निजाम के बल-बल जइए
मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाइ के।

- अमीर ख़ुसरो !!

आ साजन मोरे नयनन में - अमीर ख़ुसरो

आ साजन मोरे नयनन में, सो पलक ढाप तोहे दूँ
न मैं देखूँ औरन को, न तोहे देखन दूँ

अपनी छवि बनाई के जो मैं पी के पास गई
जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय

संतों की निंदा करे, रखे पर नारी से हेत
वे नर ऐसे जाऐंगे, जैसे रणरेही का खेत

खुसरो सरीर सराय है क्यों सोवे सुख चैन
कूच नगारा सांस का, बाजत है दिन रैन

- अमीर ख़ुसरो !!

सकल बन फूल रही सरसों - अमीर ख़ुसरो

सकल बन फूल रही सरसों,
सकल बन फूल रही....
अम्बवा फूटे, टेसू फूले, कोयल बोले डार डार,
और गोरी करत शृंगार
मलनियां गढवा ले आई करसों
सकल बन फूल रही...

तरह तरह के फूल खिलाए,
ले गढवा हातन में आए ।
निजामुदीन के दरवाजे पर,
आवन कह गए आशिक रंग,
और बीत गए बरसों ।

सकल बन फूल रही सरसों ।

- अमीर ख़ुसरो !

(सकल बन - सघन बन)