कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद

दक्षिण भारत के हिन्दीतर क्षेत्र में विगत २ दशक से हिन्दी साहित्य के संरक्षण व संवर्धन में जुटी संस्था. विगत २२ वर्षों से निरन्तर मासिक गोष्ठियों का आयोजन. ३०० से अधिक मासिक गोष्ठियाँ संपन्न एवं क्रम निरन्तर जारी...
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Wednesday, 6 July 2016

हर दफ्तर में एक बड़ी सी, कुर्सी पाई जाती है - ऋषभ देव शर्मा

हर दफ्तर में एक बड़ी सी, कुर्सी पाई जाती है
जिसके आगे बड़े-बड़ों की, कमर झुकाई जाती है

अंग्रेज़ों की बात नहीं है, यह अपना ही शासन है
सुनो ! पेट की ख़ातिर रेहन, रीढ़ धराई जाती है

मछुआरा हर बॉस यहाँ पर, बाँसी-काँटा थामे है
रोज़ी का संकट भारी है, देह भुनाई जाती है

ठाली अफ़सर, खाली दफ्तर, घूम-घूमकर देखा है
गाल बजाए जाते हैं या, जय-जय गाई जाती है

सहने की सीमा होती है, कितना और सहें, यारो!
क्यों जनता कुलवधू बिचारी , मौन सताई जाती है

उठो, सत्य के पहरेदारो ! तोड़ झूठ के मयखाने
सौ-सौ संगीनें उठने पर, कलम उठाई जाती है

- ऋषभ देव शर्मा !!

माला-टोपी ने मिल करके कुछ ऐसा उपचार किया - ऋषभ देव शर्मा

माला-टोपी ने मिल करके कुछ ऐसा उपचार किया
भारत-पुत्रों ने भारत के पुत्रों का संहार किया

ऊंची बुर्जी के तलघर में ज्वाला का भण्डार किया
मेरे अमरित के सरवर में कटु विष का संचार किया

इसी नवम्बर में बस्ती में बैमौसम के बर्फ गिरी
पगली एक हवा ने सबको घर से बेघरबार किया

धूप चढ़े पर श्वेत कबूतर जभी घोंसले से निकला
बलि पूजा के काले पंजों ने गर्दन पर वार किया

परखनली में नेता भरकर कब से यह जनता बैठी
कुर्सी पर पधरे लोगों ने बहुत गुप्त व्यापार किया

विश्वासों के हत्यारों को जीने का अधिकार नहीं
यही फकीरा ने सोचा है जितनी बार विचार किया

लोकद्रोह के सब षड्यंत्रों के हम शीश तराशेंगे
लोकतंत्र की सान चढा़कर शब्द-शब्द हथियार किया

- ऋषभ देव शर्मा !!

एक ऊँचा तख्त जिस पर भेड़िया आसीन है - ऋषभ देव शर्मा

एक ऊँचा तख्त जिस पर भेड़िया आसीन है
और मंदिर में सँपेरा मंत्रणा में लीन है

बात पगड़ी और टोपी की यहाँ तक बढ़ गई
नाचते षड्यंत्र, बजती देशद्रोही बीन है

दे रहे उपदेश में गुरु गोलियाँ उन्माद की
आज पूजा के प्रसादों में मिली कोकीन है

शूल पाँवों के निकालें, शूल लेकर हाथ में
यह समय की है ज़रूरत, नीति यह प्राचीन है

- ऋषभ देव शर्मा !!

उगी रोटियाँ देख बाली गेहूँ की - ऋषभ देव शर्मा

उगी रोटियाँ देख बाली गेहूँ की
पकी खड़ी हर खेत बाली गेहूँ की

सफ़र किया बाज़ारों का खलिहान ने
ख़ाली-ख़ाली पेट बाली गेहूँ की

गलियारों में होली की तैयारियाँ
उपजे बीज अनेक बाली गेहूँ की

मिले न अपना ख़ून उनकी मदिरा में
करे बग़ावत एक बाली गेहूँ की

टिड्डी-दल की ख़ैर नहीं इस बार तो
ताने हुए गुलेल बाली गेहूँ की

- ऋषभ देव शर्मा !!