कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद

दक्षिण भारत के हिन्दीतर क्षेत्र में विगत २ दशक से हिन्दी साहित्य के संरक्षण व संवर्धन में जुटी संस्था. विगत २२ वर्षों से निरन्तर मासिक गोष्ठियों का आयोजन. ३०० से अधिक मासिक गोष्ठियाँ संपन्न एवं क्रम निरन्तर जारी...
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Wednesday, 6 July 2016

दोहे - कुंवर बेचैन

भावुक मन औ' सिंधु का, एक सरीखा रूप
जिस पर जितनी तरलता, उतनी उस पर धूप

सज्जन का औ' मेघ का, कहियत एक सुभाय
खारा पानी खुद पियै, मीठा जल दे जाय

पानी पर कब पड़ सकी, कोई कहीं खरोंच
प्यासी चिड़िया उड़ गईं, मार नुकीली चोंच

जब से कद तरु के बढ़े, नीची हुई मुंडेर
ताक-झाँक करने लगे, झरबेरी के पेड़

नदियों ने जाकर किया, सागर में विश्राम
पर आवारा मेघ का, धाम न कोई ग्राम

सिसक-सिसक गेहूँ कहें, फफक-फफक कर धान
खेतों में फसलें नहीं, उगने लगे मकान

वैसे तो मिलते नहीं, नदिया के दो कूल
प्रिय ने ले निज बाँह में, खूब सुधारी भूल

मधुऋतु का कुछ यों मिला उसको प्यार असीम
कड़वे से मीठा हुआ सूखा-रूखा नीम

रस ले, रंग ले, रूप ले, होते रहे निहाल
जैसे ही पूरे पके, छोड़ चले फल डाल

- कुंवर बेचैन !!

वर्षा हाइकु - कुंवर बेचैन

आषाढ़ माह
उगी मन-मोर में
नृत्य की चाह

पहला मेह
भीतर तक भीगी
गोरी की देह

पहला मेह
या प्रिय के मन से
छलका स्नेह

हुई अधीर
मेघ ने छुआ जब
नदी का नीर

देखे थे ख़्वाब
भर दिए मेघों ने
सूखे तालाब

भरे ताल
पास खड़े पेड़ भी
हैं खुशहाल

लिक्खे सर्वत्र
आसुओं की बूँदों से
पेड़ों ने पत्र

जलतरंग
जल बना, तर भी -
बना मृदंग

ये नन्ही नाव
काग़ज़ में बैठे हैं
बच्चों के भाव

पूरा आकाश
दे गया कृषकों को
जीने की आश

छतरी खुली
छूट रही हाथ से
ये चुलबुली

भीगी सड़क
फिसल मत जाना
ओ बेधड़क

चौपालों पर
गूँज उठे हैं ऊँचे
आल्हाके स्वर

इंद्रधनुष
बिखरा कर रंग
कितना खुश

पानी की प्यास
धरा हो या गगन
सबके पास

- कुंवर बेचैन !!